Arab countries mutual war made millions of bloodshed over the years people becoming homeless

अरब मुल्क: खूनखराबे में लाखों खाक, नहीं रुक रही आपसी जंग

Contributor: Vatsal Srivastava

मध्य पूर्व से जुड़ी खबरों में हम हमेशा अरब जगत का नाम सुनते होंगे। इन अरब देशों में कुल 21 देश हैं। इनके नाम क्रमशः सऊदी अरब, मिस्र, यूएई, कतर, अल्जीरिया, इराक, कुवैत, मोरक्को, ओमान, लिबिया, सूडान, ट्यूनीशिया, लेबनान, सीरिया, यमन, जॉर्डन, बहरीन, मॉरिटानिया, जिबूती, सोमालिया, फलस्तीन है। इस्लामिक संस्कृति का केंद्र कहे जाने वाले इन देशों में पिछले कई सालों से आपसी गृह युद्ध चल रहा है। इसके कारण लाखों लोग बेघर हो चुके हैं। अरबों रुपयों की संपत्ति खाक हो चुकी है। लाखों लोग अपनी जानें गंवा चुके हैं, इतना सब कुछ होने के बाद जंग अब भी चल रहा है।

अरब देशों का युद्ध कोई आज की घटना नहीं है। सालों पुराना है। मुस्लिम समाज का फैलाव ऐसे ही हालात में हुआ। चाहे वह पहली बार कुरैश कबीले को जीतकर इस्लाम का परचम लहराना हो या
सीरिया पर हमला कर उसे इस्लामिक मुल्क में बदलना। भारत को जीत कर तुर्कों ने बाबर के सामने यह शर्त रखी थी कि वह उसे मुस्लिम देश बना देगा। इन अरब देशों में आपसी युद्ध की एक प्रमुख वजह यह है कि जिन हालातों में इन इस्लामिक देशों का विकास हुआ था, कुछ लोग अब भी उन्ही हालातों को बनाए रखना चाहते हैं।

मुस्लिम देशों का एक बड़ा हिस्सा आज भी उसी परंपरा को जी रहा है, जिस पर उनके पहले की नस्लें चली थीं। हालांकि एक हिस्सा हमेशा इसके विद्रोह में खड़ा रहता है। वह जिन अधिकारों की मांग करता है, सरकारें उसे देने से मना कर देती हैं। ऐसे में विद्रोह और युद्ध के हालात बन जाते हैं। पिछले कई सालों से सीरिया, लीबिया और यमन में ऐसी ही स्थिति है।

खाड़ी देशों का अजब हाल है। जब ये देश कुछ आतंकी सरगनाओं जैसे अलकायदा, आईएसआईएस को अपने देश से निकाल देते हैं तो कुछ दूसरे देश उनको अपने देश में ठिकाना दे देते हैं। उन्हें आर्थिक मदद करते हैं और नए सिरे से उनको तैयार करते हैं। इस मामले में संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका भी उचित नजर नहीं आती। अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर केवल कुछ चंद ताकतें ही मिलकर आपस में फैसला ले लेती हैं, जब किसी मुद्दे पर सहमति बनती नज़र आती है तभी अचानक
कहीं से वीटो की गूंज सुनाई पड़ जाती है।

इससे टकराव कभी समाप्त नहीं हो पाएगा। युद्ध के हालात और भयावह होंगे। इनसे निपटने के
लिए खाड़ी देशों को ही कुछ बदलाव लाने होंगे। पुरानी परम्पराओं और रवैयों को छोड़ने होंगे, शांतिपूर्ण रणनीति अपनानी होगी, एकता का प्रसार करना होगा और साथ ही साथ वैश्विक ताकतों को स्वार्थ छोड़कर वैश्विक कल्याण पर ध्यान केंद्रित करना होगा।

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