आओ मिलकर नई दुनिया की संरचना करें, अपनों को अपनी जड़ों से जोड़े रखें

भगवान ने जो आंखें दी है, उससे हमें सब लोग दिखाई पड़ते हैं, लेकिन हम खुद को नहीं देख सकते हैं। भगवान चाहते हैं कि सामने वाले को हंसते हुए, खुशी से रहते हुए और आनंद की अनुभूति करते हुए हम देख सकें।

गुस्ताखी करने की मत कर हिमाकत

एक फिल्म स्टार एक एड शूट कर एक दिन में ही करोड़ों रुपए कमा लेता है, लेकिन एक आम आदमी जिंदगी के साठ बरस तक नौकरी और मजदूरी करके भी एक करोड़ नहीं कमा पाता है।

जखनी मॉडल: सूखे बुंदेलखंड में लहलहाईं फसलें, कुएं भी भर गए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ समय पहले ग्राम प्रधानों को लिखे पत्र में सबसे पहले मेड़बंदी का ही जिक्र किया था। बांदा का जखनी गांव इस मामले में रोल मॉडल बना और उसका नतीजा यह है कि यहां का जलस्तर में तेजी से इजाफा हुआ। केंद्रीय भूजल बोर्ड, नीति आयोग भारत सरकार और जलशक्ति मंत्रालय ने इस जखनी मॉडल को स्वीकारा।

लॉकडाउन में जरूर देखें ये 5 अंडररेटेड कॉमेडी मूवीज

अगर आपको डेडपूल जैसी फिल्में पसंद हैं तो इस फिल्म को जरूर देखिए। 2018 में आई इस फिल्म में अभिमन्यु दासानी और राधिका मदान को मुख्य किरदार में दिखाया गया है। इसमें एक सूर्या नाम के एक लड़के के शरीर में दर्द ना होने की बीमारी दिखाई गई है।

प्रकृति के अनुशासन को तोड़ा तो भयावह होगा मंजर

तीसरी दुनिया के देश सिर्फ उनको सिर्फ हसरत भरी नजरों से देखते हुए अपने को आधुनिक उन्नति की राह पर आगे बढ़ने में लगे हैं, ये विकासशील राष्ट्र कहे जाते हैं, जबकि पिछड़े सभी राष्ट्र दूसरी दुनिया या अविकसित राष्ट्र मान लिए गए हैं।

बीस साल पहले Film ‘हेरा फेरी’ से मिली Real Comedy को नई जान

फ़िल्म में संजय दत्त को श्याम की भूमिका (Role) के लिए चुना गया था, लेकिन ड्रग्स और प्रतिबंधित हथियारों को रखने के मामले में जेल जाने और मुकदमे में फंसे होने से उनको इस प्रोजेक्ट से बाहर निकलना पड़ा।

अजूबों से भरी दुनिया की सच्चाई है विविधता

दुनिया के सभी सुखों से आबाद लोग भी उस सुख से ऊब जाते हैं और ऐसी जगह और स्थिति की तलाश में रहते हैं, जहां वह सुख और उसका संसार न रहे। विविधता हमेशा अच्छी लगती है, आकर्षित करती है और भावनाओं को बढ़ावा देती है। एकरूपता टिकाऊ नहीं होती है। वह अपने आप में ही बोझिल लगती है।

घड़ी मुश्किल है, लेकिन उम्मीद का दामन न छोड़ें, सहारा दें, मदद को आगे आएं

हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि देश को चलाने के लिए बड़े बुद्धिजीवियों से कहीं ज्यादा जरूरत उन लोगों की होती है, जो शारीरिक श्रम करते हैं। किसी कंपनी का उत्पादन उसके श्रम पर निर्भर करता है न कि इस पर कि वहां कितने प्रबंधक (Manager) हैं।

सारी निराशाओं के बावजूद हम जीतेंगे

स्थिति इससे भी भयावह और वीभत्स है, परन्तु सब कुछ लिखकर डराना नहीं चाहता हूं, मैंने पहले ही कहा है कि “मुश्किलें और चुनौतियां बड़ी हैं, पर डर और भयभीत रहना भी उपाय नहीं है।”