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कौन नागरिक और कौन गैर नागरिक, ऐसे समझें पूरी कहानी

Photo source: Indian Express

समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (National Population Register) ये दोनों मौजूदा हालात में भारत की सबसे बड़ी जरूरत है। एक ओर जहां समान नागरिक संहिता (UCC) संविधान की मूल भावना को और भी मजबूती प्रदान करती है तो वहीं राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (NPR) भारत की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को और भी मजबूत करता है। देश के तमाम बुद्धिजीवी वर्ग के लोगों द्वारा इन दोनों का विरोध किया जा रहा है। समान नागरिक संहिता देश के लिए एक आवश्यक कानून है तो राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर एक संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसके तहत हर देश अपने नागरिकों का हिसाब किताब रखता है। ऐसे में भारत में यह लागू होने पर दिक्कत कैसी?

भारत में बांग्लादेश पाकिस्तान अफ़गानिस्तान म्यांमार भूटान जैसे देशों से बड़े पैमाने पर घुसपैठिए आए हैं, जिनका उद्देश्य भारत में आंतरिक अशांति पैदा करना, बलात्कार, चोरी, हत्या, धार्मिक उन्माद जैसी घटनाओं को अंजाम देकर भारत में सामाजिक, राजनीतिक अस्थिरता पैदा करना है। क्योंकि वे जानते हैं कि आज संपूर्ण एशिया महाद्वीप में भारत के सभी प्रतिद्वंद्वी पड़ोसी देश भारत से सामने से युद्ध नहीं लड़ सकते हैं, ऐसे में ये अपनी छद्म कूटनीति से भारत की बढ़ती ताकत को कम करना चाहते हैं। इनका साथ भारत में बैठी हुई इनकी बी टीम बखूबी दे रही है। वह भारत सरकार की संवैधानिक प्रक्रिया राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर पूरी नहीं होने देना चाहते हैं।

देेश का बुद्धिजीवी वर्ग तरह-तरह के तर्क देता है कि इतने बड़े पैमाने पर करोड़ों लोगों को एनआरसी से बाहर किया जाएगा तो उनका क्या होगा? क्या उनके मूल देश उन्हें स्वीकार करेंगे? ऐसे में वह भारत में ही रहेंगे तो एनआरसी की जरूरत क्या? लेकिन मुझे इतना जरूर पता अगर वह बन गया तो अवैध रूप से भारत में आए बांग्लादेशी, पाकिस्तानी, म्यांमार घुसपैठियों को डिटेंशन सेंटर के भीतर रख दिया जाएगा। उन चिन्हित लोगों पर भारत सरकार नजर रखेगी। भविष्य में भारत सरकार उनको उनके मूल देश की सरकार से बातचीत कर अपनी विदेश नीति से वापस भेज देगी।

हाल ही में भारतीय संसद द्वारा नागरिकता संशोधन कानून बनाया गया, जिसका भारत के विभिन्न हिस्सों में जमकर विरोध किया गया, देश के बुद्धिजीवीयों का कहना है कि इसमें हिंदू, सिख, ईसाई, बौद्ध, पारसी जैसे सभी धर्मों का नाम है, लेकिन मुस्लिम धर्म का नाम नहीं है ऐसा क्यों है? मैं बताना चाहूंगा कि भारत के पड़ोसी बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में वर्तमान समय में इन्हीं धर्म के लोग धार्मिक रूप से सबसे अधिक प्रताड़ित किए जा रहे हैं और 1947 की आजादी से पहले बंटवारे की शर्तों में इस बात का पूर्ण रूप से उल्लेख है कि पाकिस्तान में रहने वाले हिंदू, सिख, ईसाई, बौद्ध, पारसी जैन धर्म के लोग अपनी स्वेच्छा से भारत आ सकते हैं और भारत सरकार की जिम्मेदारी होगी कि उन्हें भारत की नागरिकता और पुनर्वास की सुविधा उपलब्ध कराएं। चूंकि बड़े पैमाने पर लोग बंटवारे के बाद पाकिस्तान से भारत आए और पाक समर्थित मुस्लिम जो भारत में रहते थे वो टू-नेशन थेयरि के हिसाब से पाकिस्तान में रहने लगे, पाकिस्तान ने उन्हें नागरिकता दी या नहीं दी, उनके ऊपर उत्पीड़न कर रही है, उन्हें मुहाजिर कह रही है, इससे हमें कोई मतलब नहीं। क्योंकि ये वही लोग थे, जो मुस्लिम लीग के साथ टू-नेशन थ्योरी के लिए खून खराबे पर उतारू थे।

हम उन शिया और अहमदिया मुस्लिमों पर कैसे भरोसा करें, जो पाकिस्तान में रह रहे हैं। आज से 70 वर्ष पूर्व उन्होंने ही महात्मा गांधी को रुला दिया था और भारत माता के दो टुकड़े करने को मजबूर कर दिया और भारत छोड़कर पाकिस्तान के साथ चले गए थे। किसी भी कीमत पर ऐसे देशद्रोहियों को भारत सरकार कभी नहीं स्वीकार करेगी। हां, वहां रहने वाले अल्पसंख्यक वर्ग के हिंदू, सिख, इसाई आदि अल्पसंख्यक धर्म के लोगों को संरक्षण देना भारत सरकार की जिम्मेदारी है। क्योंकि आजादी के बाद महात्मा गांधी ने साफ-साफ कहा था कि पाकिस्तान के अल्पसंख्यक किसी भी समय भारत आ सकते हैं। भारत सरकार की जिम्मेदारी होगी, उनका पुनर्वास और नौकरियों में भागीदारी सुनिश्चित करे।

डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने भी पाकिस्तान में दलितों पर हो रहे अत्याचार से दुखी होकर कहा था कि पाकिस्तान के सभी दलितों को भारत आ जाना चाहिए। 1950 के नेहरू लियाकत अली समझौते में भी साफ-साफ दोनों देशों ने वादा किया था कि भविष्य में दोनों देशों के अल्पसंख्यक एक दूसरे के यहां जा सकेंगे। दोनों देशों का कर्तव्य होगा कि वह उन्हें नागरिकता के साथ-साथ पुनर्वास की सुविधाएं उपलब्ध कराएं। आज पाकिस्तान के शिया-अहमदिया समुदाय पर उनके अपने ही इस्लाम धर्म के कट्टरपंथियों द्वारा उत्पीड़न की घटनाएं पूरे विश्व समुदाय के सामने आ रही है।

यह एक सच्चाई है, लेकिन उसमें भारत क्या कर सकता है। यह उनका अपना आंतरिक मामला है, धार्मिक उत्पीड़न एक धर्म के लोग दूसरे धर्मों पर करते हैं, लेकिन यहां एक ही धर्म के लोग आपस में लड़ रहे हैं। इसे गृहयुद्ध की श्रेणी में माना जाता है, धार्मिक उत्पीड़न नहीं। यदि सही में किसी भी धर्म के लोगों के ऊपर धर्म के आधार पर उत्पीड़न हो रहा है तो भारत को शरण देनी चाहिए। मैं बताना चाहूंगा कि भारत सरकार ने पिछले 6 वर्षों में 500 से अधिक पाकिस्तानी बांग्लादेशी और अफगानिस्तान मूल के मुस्लिमों को भारत में नागरिकता दी है।

नागरिकता संशोधन कानून में इस बात का जिक्र कहीं नहीं है कि मुस्लिम धर्म के लोगों को भारत में नागरिकता नहीं दी जाएगी। यदि भारत का विपक्ष कहता है आप सबको दीजिए और वह चाहेगा कि म्यांमार में ख़ुद अपना घर छोड़कर आए हुए रोहिंग्या को शरणार्थी के रूप में स्वीकार करें यह तो यह उनकी सबसे बड़ी भूल है, क्योंकि रोहिंग्या एक आक्रमणकारी हैं। उन्होंने अपने देश में सरकार के खिलाफ बगावत करके हजारों बौद्धों का नरसंहार किया है। ऐसे में भारत सरकार इन नरपिचाशों को तिनके भर की जगह भी नहीं देगी।

विपक्ष लगातार केंद्र सरकार पर आरोप लगा रही है कि वह नागरिकता संशोधन कानून के जरिए भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का प्रयास कर रही है। उनका यह आरोप निराधार है। क्योंकि यदि केंद्र में बैठी भाजपा की सरकार भारत को हिंदू राष्ट्र और अधिक से अधिक हिंदुओं को नागरिक बनाकर वोट के रूप में लाभ लेने की कोशिश करती तो वह श्रीलंका, भूटान, नेपाल, तिब्बत जैसे देश को भी लिस्ट में शामिल करती।

दूसरी ओर रोहिंग्या शरणार्थियों में बड़े पैमाने पर मुस्लिम के अतिरिक्त हिंदू भी है, लेकिन भारत में उन्हें नहीं स्वीकार किया जा सकता है। साथ ही केंद्र में बैठी सरकार ने उन्हें स्वीकार भी नहीं किया है, क्योंकि वे शरणार्थी नहीं आक्रमणकारी हैं। इनका धर्म चाहे जो भी हो, लेकिन उनका उद्देश्य एक ही है, पूरे भारत में अशांति और अस्थिरता पैदा करना।

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