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सारी निराशाओं के बावजूद हम जीतेंगे

बेशक कदम-कदम पर मुश्किलें हैं और चुनौतियां भी बड़ी हैं, पर डर और भयभीत रहना भी उपाय नहीं है। सावधानी बरतें और हालात का डटकर सामना करें। मेरा उन लोगों से खास तौर पर निवेदन है, जो हर वक्त सरकार की बुराई करने में ही अपना वक्त नष्ट कर रहे हैं। सरकार और सत्ताधारी दल की नीतियों और विचारों से विरोध होना गलत नहीं है, लेकिन जब दुश्मन सामने खड़ा हो तो उस समय हम आपस में ही एक-दूसरे के खिलाफ जहर उगलकर जीत नहीं पाएंगे।

अच्छा होगा कि हम सब हर वह काम करें जिससे कोरोना वायरस का संक्रमण रुके, और हालात सामान्य हो सके। समझने वाली बात यह है कि कोरोना वायरस का खतरा कुछ देश और नस्ल तक ही सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया इसकी विभीषिका से परेशान है। अगर इस पर काबू नहीं पाया गया तो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पूरी दुनिया के लिए यह सर्वाधिक विनाशकारी दौर होगा।

यह वह समय है, जिसमें युद्ध नहीं हो रहा है, लेकिन युद्ध से ज्यादा भयानक परिस्थितियां बन गई हैं। जो लोग बीमारी से बच भी जाएंगे, वे आगे गंभीर आर्थिक मंदी और बेरोजगारी से मरने की आशंका से पीड़ित होंगे।

अभी तो कई सरकारी और निजी क्षेत्र में ‘वर्क टू होम’ कराया जा रहा है, और कई जगह पूरी तरह बंदी के हालात हैं, लेकिन स्थिति सामान्य नहीं हुई तो ‘वर्क टू होम’ भी बंद करने की नौबत आ सकती है। सोचिए उनका क्या होगा, जो कंपनियों, ऑफिसों, मॉल्स, सिनेमा हालों, स्कूल-कॉलेजों के बाहर चाय, नास्ते, फलों की दुकानें लगाते हैं, उन्हें अब ग्राहक ही नहीं मिल रहे हैं।

ई-रिक्शा, हाथ रिक्शा और ऑटो चलाने वाले को सवारियां नहीं मिल रही हैं। छोटे ढाबों और बाजारों में सन्नाटा पसरा है। ऐसे लोगों के घर कैसे चलेंगे। भूख तो सबको लगती है। स्थिति इससे भी भयावह और वीभत्स है, परन्तु सब कुछ लिखकर डराना नहीं चाहता हूं, मैंने पहले ही कहा है कि “मुश्किलें और चुनौतियां बड़ी हैं, पर डर और भयभीत रहना भी उपाय नहीं है।”

21वी सदी के इस त्रासदी से हमें निजात पाना होगा। हम सिर्फ इतना कहेंगे कि हमें सावधानी से काम करना होगा। पहले से जहरीली हवा में और जहर घोलने की बजाय जहर को नष्ट करना होगा। स्वयं के साथ-साथ दूसरों का भी ध्यान रखें। हम अलग-अलग घरों में रहते हैं, लेकिन हवा सबको एक ही लगती है। फिर भी सारी निराशाओं के बावजूद हम जीतेंगे।

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