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कोविड-19 की मार: छोटे उद्यमी और श्रमिकों के लिए इधर कुंआ उधर खाई

Contributor: Akash Singh

कोविड-19 महामारी के प्रकोप को कम करने के लिए देश में चल रहे लॉकडॉउन के कारण बड़े पैमाने पर भारतीय अर्थव्यवस्था प्रभावित हुई है। भारत ही नहीं पूरी दुनिया इससे बुरी तरह प्रभावित है। वैश्विक अर्थव्यवस्था संकट के दौर से गुजर रही है। विश्व बैंक ने भी कोरोना संकट के कारण देश की आर्थिक वृद्धि दर को इस वित्तीय वर्ष में 1.5 प्रतिशत से 2.8 प्रतिशत के बीच रहने का अनुमान लगाया है।

गौरतलब है कि ऐसा हुआ तो देश का आर्थिक विकास दर 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद अपने सबसे निचले स्तर पर होगा, वहीं राष्ट्रीय सैंपल सर्वे (National Sample Survey Office – NSSO) और पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वेज (Periodic Labour Force Survey- PLFS) के मुताबिक करीब 14 करोड़ गैर कृषि रोजगारों पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है, इनमें स्थायी कर्मचारी ही नहीं, दिहाड़ी मजदूर भी शामिल हैं, वहीं देशभर में असंगठित क्षेत्रों की नौकरियों पर भी छंटनी का खतरा मंडरा रहा है, जिससे देश में आने वाले समय में बेरोजगारी का संकट गहराना लगभग तय है।

दूसरी ओर हमारे देश की अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ी भागीदारी रखने वाले पोल्ट्री फार्मिंग, मत्स्य पालन, चमड़ा उद्योग, हस्त शिल्प, रेशम, खाद्य उत्पादन, मधुमक्खी पालन, औषधि खेती और दुग्ध उत्पादन जैसे अन्य बहुत से छोटे उद्योग पूरी तरह से नष्ट हो गए हैं। व्यापारियों के शीर्ष संगठन Confederation of All India Traders – CAIT का अनुमान है कि कोरोना वायरस महामारी और उसकी रोकथाम के लिए हुए देशव्यापी बंद से खुदरा कारोबार में 30 अरब डॉलर का भारी नुकसान हुआ है, चूंकि भारत में छोटे उद्योग अधिकतर मध्यमवर्गीय लोग करते है, और अपना लघु उद्योग शुरू करने के लिए बैंकों से लोन भी लिए रहते हैं, ऐसे में इन उद्योगों पर कोरोना (Corona) की मार सबसे जादा पड़ रही है।

ऊपर से छोटे उद्यमियों को इनके रखरखाव का खर्च भी झेलना पड़ रहा है, जबकि इनके उत्पाद की बिक्री न के बराबर है। छोटे उद्यमी बैंकों को लोन की किश्त तक देने में समर्थ नहीं हैं। बहुत सारे उद्यमी तो घाटा सहकर अपने उद्योगों को खत्म भी कर रहे हैं, लेकिन बैंक से लिए गए लोन को वे कैसे खत्म कर पाएंगे। यह समस्या सबसे बड़ी व विकट है। लॉकडाउन जारी रहे अथवा हट जाए, दोनों ही स्थिति में इन्हें नुकसान झेलना होगा।

व्यापारियों की मांग है कि ऐसे में सरकार ज्यादा नहीं तो कम से कम छह महीने की लोन किश्त की भरपाई स्वयं करें, अन्यथा छोटे उद्यमी लॉकडाउन खत्म होने के बाद नीलामी की कगार पर आ जाएंगे। इस स्थिति से बचने के लिए सरकार इन उद्योगों से जुड़े उत्पादों में जिस भी उत्पाद की बिक्री संभव हो, उसके लिए नीति बनाकर व्यवस्था करे, साथ ही छोटे उद्योगों व असंगठित क्षेत्र से जुड़े हुए श्रमिकों की मदद के लिए भी कुछ विशेष पैकेज जारी करे, इसके अतिरिक्त अभी से लॉकडाउन खत्म होने के बाद उत्पन्न होने वाले बड़े पैमाने पर बेरोजगारी के संकट का सामना करने के लिए ठोस रणनीति तैयार करे। 

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