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प्रकृति के अनुशासन को तोड़ा तो भयावह होगा मंजर

दुनिया की राजनीतिक-सामाजिक और भौगोलिक हालात में बदलाव के संकेत उभरने लगे हैं। लंबे वक्त से जो देश ताकत और समृद्धि के बल पर दुनिया में राज कर रहे थे, वे अब नई तरह की और अनोखी मुसीबतों से जूझ रहे हैं। दूसरे विश्व युद्ध और उसके बाद शीत युद्ध के समय से अमेरिका दुनिया का बादशाह बनकर सभी देशों को परोक्ष और अपरोक्ष रूप से प्रभावित करता रहा है। यूरोप, दक्षिण अमेरिका, उत्तरी अमेरिका, एशिया समेत अन्य महाद्वीपों के तमाम राष्ट्र या तो उसके समर्थक रहे हैं या फिर उसके दबाव में जी रहे हैं।


जब से दुनिया में पैसा या पूंजी ताकत का मानदंड बना तब से नैतिक नियम और अनुशासन दम तोड़ चुके हैं। यही वजह है कि विकसित राष्ट्र कहलाने का अधिकार सिर्फ उनको मिला, जो अकूत पैसे वाले हैं और जिनके पास कुबेर के खजाने की तरह धन-संपदा भरी हुई है। तीसरी दुनिया के देश सिर्फ उनको सिर्फ हसरत भरी नजरों से देखते हुए अपने को आधुनिक उन्नति की राह पर आगे बढ़ने में लगे हैं, ये विकासशील राष्ट्र कहे जाते हैं, जबकि पिछड़े सभी राष्ट्र दूसरी दुनिया या अविकसित राष्ट्र मान लिए गए हैं।

ऐसे में तो यह लगता है कि दुनिया खुद में आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और भौगोलिक रूप में भेदभावों से भरी है। मानव संस्कार में भेदभाव करने को गलत और अन्याय के रूप में बताया जाता है, लेकिन इतिहास का कोई भी काल अपने व्यवहार में इस शब्द से अछूता नहीं रहा। व्यवहार और मनोविज्ञान शास्त्र, धर्म, मजहब और दुनिया के सामाजिक संरचना में भेदभाव शब्द का उल्लेख न हुआ हो, ऐसा असंभव है। तब कोरोना वायरस महामारी के फैलने पर दुनिया में एक नई बहस छिड़ गई है। आम तौर पर भेदभाव का व्यवहार समृद्ध और अभाव, धनी और निर्धन, प्रभावशाली और कमजोर के बीच दिखता है।

लेकिन कोरोना ने तो सबसे ज्यादा उसी पर कहर ढाया, जिसकी पहचान दुनिया के बादशाह और दबंग के रूप में है। जो धनी, प्रभावशाली, मजबूत और विकसित राष्ट्र है। एक छोटे से विषाणु ने विश्व के इस दबंग राष्ट्र अमेरिका को असहाय बना दिया। इतना विवश और कमजोर अमेरिका कभी नहीं रहा।

सोचिए क्या होगा अगर कोरोना वायरस पर काबू न पाया जा सका और दुनिया में भयावह तबाही का मंजर जारी रहा। वह भी तब जब दुनिया के प्रभावशाली राष्ट्र इससे ज्यादा प्रभावित हैं। यह मंजर देखने के बाद व्यवहार शास्त्र के पुरोधा क्या कहेंगे। कोरोना ने इसका ध्यान नहीं रखा कि दबंगों को न परेशान किया जाए। प्रकृति के आगे किसी की दबंगई नहीं चलती है। हर कोई बेबस, लाचार, असहाय और कमजोर है।

प्रकृति का अपना अनुशासन है। उस अनुशासन को जो तोड़ेगा, वह प्रकृति के कोप का भागी बनेगा। तथाकथित भौतिक विकास और वैज्ञानिक उन्नति ने इंसान को प्रकृति से दूर कर दिया नतीजा प्रकृति ने अपना कोप दिखाया। प्राकृतिक आपदा और त्रासदी ने एक झटके में विनाश की भयावह तस्वीर दुनिया के सामने रख दी। इसके बाद भी हम अपने दंभ से प्रकृति को चुनौती देने में पीछे नहीं हैं। न जानें इंसान कब सुधरेगा और इससे बाहर निकलेगा।

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