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नेताओं की Policy से यूं हो रहें किसान तबाह

पिछले दिनों देश में किसान दिवस मनाया गया, युवाओं ने अपने फेसबुक व्हाट्सएप स्टेटस में “हैप्पी फ़ारमर डे ” लिखकर किसानों के प्रति अपने सम्मान का भाव प्रकट किया तो वहीं विभिन्न राज्यों की सरकारों, केंद्र सरकार ने जगह जगह किसानों से संबंधित कार्यक्रम में अपने नेताओं द्वारा किसानों के सम्मान में दो चार कसीदे पढ़वा दिए और खानापूर्ति कर दी। लेकिन हकीकत यह है देश का किसान आज हैप्पी नहीं सैड है। क्योंकि कृषि से जुड़े तमाम समस्याओं को सरकारें लगभग 72 सालों से टाल रही हैं, किसी भी सरकार ने आजतक इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाने की जरूरत नहीं समझी है।

सभी राजनीतिक दलों को किसान नाम का एक वोट बैंक दिखाई देने लगा है और उन्होंने मानो तय ही कर लिया हैं कि वो किसान का शोषण करते रहेंगे और उनसे संवाद किए बिना ही दिल्ली के बंद कमरों में अपनी सुविधानुसार कानून और योजना बनाएंगे, जिससे किसानों का कल्याण तो नहीं हो सकता, लेकिन दिल्ली के उन बंद एसी और रूम हीटर वाले कमरो में बैठे नेताओं का जरूर कल्याण हो जाता है। उन नेताओं को पता है कि अगर किसान को इस काबिल बना दिया जाए कि उन्हे कर्ज लेने की जरूरत ही ना पड़े तो उनकी दुकान बंद हो जाएगी।

आखिर क्यों आजादी के 72 सालों बाद भी किसान कर्जमाफी के लिए आवेदन कर रहे हैं। चलो कर्ज लेना तो ठीक है, परंतु वो उसे वापस क्यों नहीं कर पाते हैं और अंत में बैंकों के दबाव के कारण आत्महत्या जैसे कदम उठाते हैं, आखिर जब हमारी सरकारें जानती है कि भारतीय कृषि “मौसम का जुंआ” खेलने जैसा है तो क्यों नही सरकार पहले से ही सचेत रहती हैं। जब तक उस योजना का पूरा लाभ सभी जरूरतमंद किसानों को ना मिले, योजना बनाने से कुछ नहीं होगा। असल में इन योजनाओं का लाभ तभी मिलेगा जब किसान को इनकी जानकारी मिलेगी। योजना एक हो लेकिन उसका लाभ सभी जरूरतमंद किसानों को मिलना चाहिए, तभी योजना सफल मानी जाएगी।

हमारे देश का किसान इतना सक्षम है कि वो अपनी फसल को विपरीत मानसून परिस्थितियों में भी पैदा कर लेता है, लेकिन उसके सामने फसलों को बेचने की उचित व्यवस्था नहीं होती है। किसान अपनी सोने जैसी फसलों को औने पौने दामों पर गांव के बिचोलियों को बेच देता है और वही बिचोलिया पांच गुना ज्यादा भाव में ले जाकर बाजार में बेचता है। आखिर सरकार क्यों नहीं गांवों मे एक स्थायी फसल खरीद केंद्र की स्थापना करती है और वहां पर किसी जिम्मेदार अधिकारी की नियुक्ति करती है। आखिर क्यों किसानों को अपनी ही फसलों को बेचने के लिए बिचौलियों पर निर्भर रहना पड़ता है। इसके अतरिक्त अन्य समस्याएं जैसे खाद, यूरिया, बीज, नहरों में पानी भी समय से नहीं उपलब्ध कराया जाता है।

वर्तमान समय में एक अन्य समस्या भी है वो है नरेगा, क्योकि उसमें कार्य करने वाले मजदूर जो अब किसानों के खेतों में काम करने से मना कर देते हैं। उनको मनरेगा में मुफ्तखोरी की आदत पड़ गई है। जबकि किसान भी मनरेगा के बराबर पैसे देने को तैयार है, लेकिन मजदूर काम करने को नहीं तैयार है इसलिए सरकार को नियम बना कर मनरेगा के मजदूरों को किसानों के खेतों में काम करने के लिए जोड़ना चाहिए, ताकि किसानों की मजदूरों की समस्या भी खत्म हो जाए और उनको कुछ आर्थिक सहायता भी हो जाएगी।

जंगली जानवरों जैसे नीलगाय, जंगली सूअर आदि समस्या को भी खत्म करना होगा, तभी किसान खुशहाल जीवन जी सकेगा।सरकारें कर्जे को माफ करने को ही ये मान बैठी है कि वह किसानों के प्रति संवेदनशील हैंं और कर्जमाफी कर वह किसानों के प्रति अपने कर्तव्यों की पूर्ति कर रही है तो वे गलत सोचती है।


किसानों की मुख्य समस्या ये भी है कि मंडी में जिस भाव से वह अपनी फसल बेचता है, उससे दुगने-तिगुने ही नहीं, कई गुना अधिक भाव पर अनाज बाजार में बिकता है। ऐसा क्यों होता है, असलियत ये है कि खुली बिक्री में जिस भाव से अनाज बिकता है, अगर उसी भाव पर या उससे थोड़े कम भाव पर उसकी फसल बिक जाए तो उसका वर्ष भर गुजारा हो सकता है। लेकिन व्यवस्था में यह बदलाव किसी सरकार ने किसी नेता ने करने के बारे में कभी विचार तक नहीं किया।

अंत में मैं बस इतना कहूंगा कि सरकारों को कभी भी किसानों और जवानों को वोट- बैंक ना समझ कर भारत मां के दो हाथ समझना चाहिए, जो भारत के विकास में पूरा योगदान देते हैं और खासकर संकट के समय में तो जरूर देते हैं। चाहे मंदी रही हो अथवा प्राकृतिक आपदाएं हों, दोनों ने भारत का साथ कभी नहीं छोड़ा है। हम उन्हें कैसे छोड़ सकते हैं?

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