प्रकृति के अनुशासन को तोड़ा तो भयावह होगा मंजर

तीसरी दुनिया के देश सिर्फ उनको सिर्फ हसरत भरी नजरों से देखते हुए अपने को आधुनिक उन्नति की राह पर आगे बढ़ने में लगे हैं, ये विकासशील राष्ट्र कहे जाते हैं, जबकि पिछड़े सभी राष्ट्र दूसरी दुनिया या अविकसित राष्ट्र मान लिए गए हैं।

जानिए कितना अलग है पीएमएनआरएफ (PMNRF) से पीएमकेयर्स (PMCARES)

पीएमएनआरएफ (PMNRF) की स्थापना तब पाकिस्तान से विस्थापित हुए लोगों की मदद करने के लिए किया गया था, लेकिन बाद में इस राहत कोष का उपयोग बड़ा व्यापक हो गया था।

अरब मुल्क: खूनखराबे में लाखों खाक, नहीं रुक रही आपसी जंग

भारत को जीत कर तुर्कों ने बाबर के सामने यह शर्त रखी थी कि वह उसे मुस्लिम देश बना देगा। इन अरब देशों में आपसी युद्ध की एक प्रमुख वजह यह है कि जिन हालातों में इन इस्लामिक देशों का विकास हुआ था, कुछ लोग अब भी उन्ही हालातों को बनाए रखना चाहते हैं।

बीस साल पहले Film ‘हेरा फेरी’ से मिली Real Comedy को नई जान

फ़िल्म में संजय दत्त को श्याम की भूमिका (Role) के लिए चुना गया था, लेकिन ड्रग्स और प्रतिबंधित हथियारों को रखने के मामले में जेल जाने और मुकदमे में फंसे होने से उनको इस प्रोजेक्ट से बाहर निकलना पड़ा।

धरती नापी, सागर छाना, चूम लिया आकाश और अब असहाय

विश्व का सबसे शक्तिशाली और लगभग सभी देशों पर परोक्ष-अपरोक्ष दबाव बनाने का माद्दा रखने (और दम्भ भरने) वाला संयुक्त राज्य अमेरिका आज खुद को इतना लाचार, बेबस और निरीह महसूस कर रहा है, मानों वह टूट सा गया है।

अब मुफ्त में नहीं घूम सकेंगे भूटान, पड़ोसी देश भी दूर

निर्णय को देश की नेशनल असेंबली ने भूटान टूरिज्म लेवी एंड एक्जम्पशन बिल (Bhutan tourism levy and exemption bill) के रूप में पारित किया है।

अजूबों से भरी दुनिया की सच्चाई है विविधता

दुनिया के सभी सुखों से आबाद लोग भी उस सुख से ऊब जाते हैं और ऐसी जगह और स्थिति की तलाश में रहते हैं, जहां वह सुख और उसका संसार न रहे। विविधता हमेशा अच्छी लगती है, आकर्षित करती है और भावनाओं को बढ़ावा देती है। एकरूपता टिकाऊ नहीं होती है। वह अपने आप में ही बोझिल लगती है।

जानकारी: रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट और सीआरआर; जानें क्या हैं इनके मायने

रिजर्व बैंक ने देश के आर्थिक हालात को सुधारने के लिए कुछ नए कदम उठाए हैं।

घड़ी मुश्किल है, लेकिन उम्मीद का दामन न छोड़ें, सहारा दें, मदद को आगे आएं

हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि देश को चलाने के लिए बड़े बुद्धिजीवियों से कहीं ज्यादा जरूरत उन लोगों की होती है, जो शारीरिक श्रम करते हैं। किसी कंपनी का उत्पादन उसके श्रम पर निर्भर करता है न कि इस पर कि वहां कितने प्रबंधक (Manager) हैं।