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अफगानिस्तान के बहाने पूरे होंगे चीन के नापाक मंसूबे! दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन बिगड़ने की आशंका

Contributor: Akash Singh Photo Source: Warontherocks.com

पिछले 29 फरवरी को फारस की खाड़ी स्थित प्रायद्वीपीय देश कतर की राजधानी दोहा में अमेरिका और तालिबान के बीच अफगानिस्तान को लेकर शांति समझौते से दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन बिगड़ने की आशंका पैदा हो गई है। अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते पाकिस्तान अपने खुंखार आतंकी गुटों का तालिबान में विलय करने की कोशिश में है।

इस समझौते से अमेरिका अफगानिस्तान से अपने सैनिकों को धीरे-धीरे हटाएगा। इसका फायदा तालिबान समेत दूसरे आतंकी संगठन अफगानिस्तान को अपना सुरक्षित ठिकाना बनाकर उठाएंगे। उधर, भारत को कमजोर करने की नीयत से चीन पाकिस्तान के साथ मिलकर इन संगठनों को आर्थिक और हथियारों की मदद उपलब्ध कराएगा। ऐसे में दुनिया में आतंक का बोलबाला फिर से उफान लेगा।

तालिबान और अमेरिका के बीच समझौते के अभी कुछ ही महीने हुए हैं, लेकिन अफगानिस्तान में एक बार फिर से 90 के दशक वाले हालात बनने लगे हैं। बीते 25 मार्च को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में अल्पसंख्यक सिखों के धर्मस्थल गुरुद्वारा हर राय साहब पर फिदायीन हमला किया गया। इसमें 25 लोगों की मौत हो गई। मृतकों में दर्जन भर मासूम बच्चे भी थे।

हमले की जिम्मेदारी खतरनाक आतंकी संगठन आईएसआईएस ने लिया है। हालांकि अप्रत्यक्ष रूप से हमले का मास्टरमाइंड तालिबान को माना जा रहा है। आतंकी हमले में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई व उसके आतंकी संगठन जमात-उद-दावा का भी हाथ होना माना जा रहा है।

सबको पता है कि पाकिस्तान ने पूर्व में अफगानिस्तान-भारत संबंधों में दरार डालने के लिए तालिबान को पाला-पोसा और बढ़ावा दिया था। साथ ही चीन के इशारे पर पाकिस्तान तालिबानियों को हथियार और आर्थिक मदद भी मुहैया कराता रहा। चीन भी भारत-अफगानिस्तान और ईरान की सरकारों की दृढ़ इच्छाशक्ति से पूरे हुए त्रिपक्षीय चाबहार समझौते के बाद और भारत की महत्वाकांक्षी परियोजना नार्थ-साउथ कारिडोर से मध्य एशिया में भारत के बढ़ते दबदबे से भयभीत रहा है।

इसलिए वो तालिबान को बढ़ावा देकर इस समझौते को खत्म कराना चाहता है। इस हालात में अमेरिका के अफगानिस्तान छोड़ने के ऐलान के बाद से पाकिस्तान के आतंकवादी, जिहादी संगठनों व कुख्यात आईएसआईएस, अलकायदा जैसे आतंकी संगठनों को अपना एक नया सुरक्षित ठिकाना अफगानिस्तान के रूप में मिल गया और वे वहां बैठकर भारत समेत अन्य दक्षिण एशियाई देशों में आतंकी हमले की योजना बनाने लगे।

नतीजा यह है कि समझौते के बाद से ही कश्मीर में आतंकियों के हमले में लगातार बढ़त हो रही है। हमारे दर्जनों सैनिक लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए हैं। वैस आतंकी संगठनों का मुख्य टारगेट भारत का कश्मीर है। बीते वर्ष भारत सरकार ने कश्मीर से धारा 370 को खत्म कर भारत और कश्मीर के बीच खड़ी दीवार को गिरा दिया, जिसके बाद से पाकिस्तान व उसके आतंकी संगठन बौखलाए हुए हैं।

ऐसे में आने वाले समय में इन खतरनाक आतंकी संगठनों आईएसआईएस, तालिबान व अलकायदा के एक साथ आने से भारत समेत पूरे दक्षिण एशिया में आतंकवाद के एक नए युग की शुरुआत होने की आशंका है। इन आतंकी संगठनों के महागठजोड़ का प्रमुख लक्ष्य ग़ज़वा-ए-हिंद करना रहा है। इन सभी संगठनों का जन्म ही इसी संकल्प के साथ हुआ है।

गौरतलब है कि इस्लामिक स्टेट से जुड़े हुए एक संगठन जुनदूल खिलाफा-अल-हिंद ने अपनी पत्रिका “वॉयस ऑफ हिंद” के 24 फरवरी के अंक में भारतीय मुसलमानों को संबोधित करते हुए एक लेख लिखा है। उसमें उसने कहा है कि भारतीय मुसलमान अधिक से अधिक हमारे इस्लामिक संगठन के राजनीतिक दर्शन से जुड़े और आने वाले समय में भारत में इस्लाम का परचम लहराने के लिए संघर्ष करने को तैयार रहें।

इसी प्रकार आतंकी संगठन अल कायदा इन इंडियन सब कंटिनेंट ने अपनी पत्रिका नवा-ए-गजवातुल-हिंद के 21 मार्च के अंक में लिखा कि आने वाले दिनों में अल कायदा के जिहाद का केंद्र भारत का कश्मीर राज्य बनेगा। पत्रिका ने यह भी घोषणा की कि दक्षिण एशिया में हम अपने जिहाद फैलाने के मकसद में कामयाब होकर ही दम लेंगे। गौरतलब है कि दोनों ही आतंकी संगठनों का तालिबान से बहुत ही करीबी संबंध है।

समझौते के पूरा होने के बाद की गतिविधियों को देखकर भी यही लगता है कि इस समझौते का भारत पर एक बड़ा प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि पाकिस्तान की इमरान सरकार का तालिबान से नज़दीकी जगजाहिर है और पाकिस्तान भारत में आतंक फ़ैलाने के लिए तालिबान को माध्यम के रूप में वर्षों से प्रयोग करता रहा है।

उल्लेखनीय है कि भारत में आतांकवाद फैलाने वाले आतंकी संगठनों को पाकिस्तान सदियों से पनाह देता रहा है। परंतु पिछले कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण अब वो अपने कुख्यात और खुंखार आतंकी संगठनों को पाकिस्तान में नहीं रखना चाहता है। वो इनका एक प्रकार से तालिबान में विलय कर देना चाहता है, ऐसे में दोहा में हुए समझौते के बाद जब पूरे अफगानिस्तान की राजनीति में तालिबान का प्रभुत्व बढ़ा है, तो ये पाकिस्तान की बड़ी जीत भी मानी जा सकती है।

आने वाले समय में हो सकता है कि पाकिस्तान द्वारा तालिबान को अप्रत्यक्ष रूप से परमाणु हथियार भी दे दिया जाए, तब यह एशिया महाद्वीप समेत पूरे संसार के लिए एक बड़ा महासंकट उत्पन्न करेगा, क्योंकि इससे पहले भी पाकिस्तान ने उत्तर कोरिया की परमाणु हथियार बनाने में मदद की है, और आज उसका परिणाम भी हमारे सामने है, ऐसे में अफगानिस्तान में आने वाले समय में सत्ता की बागडोर तालिबान के हाथ में होने के बाद भारत के लिए स्थितियां चुनौतीपूर्ण होंगी।

समझौते के बाद से ही खतरनाक आतंकी संगठन आईएसआईएस का अफगानिस्तान में दखल बढ़ा है। उल्लेखनीय है कि आईएसआईएस का मध्य एशिया के बाद दूसरा लक्ष्य दक्षिण एशिया के देश हैं। भारत सरकार को आने वाले इस महासंकट से सावधान रहना होगा क्योंकि तालिबान और पाकिस्तान की मिलीभगत से हुए कंधार विमान अपहरण का दंश हम झेल चुके हैं।

उस समय मज़बूर होकर हमें खतरनाक आतंकियों को छोड़ना पड़ा था, भारत ने अब तक अफगानिस्तान को करीब तीन अरब डॉलर की मदद दी है, जिससे वहां संसद भवन, सड़कों और बांध आदि का निर्माण हुआ है, भारत सरकार ने अफ़ग़ानिस्तान में विभिन्न परियोजनाओं में अरबों डॉलर का निवेश किया है, ऐसे में अब उस तालिबान की सत्ता वापसी से ये निवेश डूब जाएगा, क्योंकि पूरे संसार में तालिबान का सबसे अधिक विरोध भारत ने पिछले तीन दशकों से किया है वहीं तालिबान के साथ मिलकर पाकिस्तान और चीन भारत के विरुद्ध मोर्चाबंदी करने में लगे हुए हैं।

अमेरिका तालिबान के सामने घुटने टेक चुका है। अफगानिस्तान की वर्तमान सरकार अमेरिका-तालिबान के बीच शांति वार्ता के खिलाफ थी। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रपति अशरफ गनी ने समझौते की प्रक्रिया शुरू किए जाने से पहले ही कह दिया था कि बेगुनाह लोगों की हत्या करने वाले समूह से शांति समझौता निरर्थक है।

इसलिए भारत को अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी और रूस के सहयोग से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी कूटनीति द्वारा तालिबान-पाकिस्तान और चीन के इस महागठजोड़ को अलग-थलग कर देना होगा, अन्यथा आने वाले समय में तालिबान भारत समेत पूरे दक्षिण एशिया के लिए सबसे बड़ी समस्या के रूप में उभरेगा।

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