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राष्ट्रीय बालिका दिवस: बालिका शिक्षा से ही बदलेगा समाज – डॉ. बीरबल झा

राष्ट्रीय बालिका दिवस: कार्यक्रम में बोलते हुए डॉ. बीरबल झा।

राष्ट्रीय बालिका दिवस: राष्ट्रीय बालिका दिवस और अंतरराष्ट्रीय शिक्षा दिवस के अवसर पर बिहार की राजधानी पटना में बालिकाओं की शिक्षा को लेकर एक महत्वपूर्ण विमर्श देखने को मिला। बोरिंग रोड चौराहा स्थित ब्रिटिश लिंगुआ परिसर में शुक्रवार को आयोजित संगोष्ठी में शिक्षा, समाज और नीतियों के आपसी संबंध पर विस्तार से चर्चा की गई। कार्यक्रम का विषय था— “जब शिक्षा बालिकाओं को सशक्त बनाती है, समाज रूपांतरित होता है”

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इस संगोष्ठी में शिक्षाविदों, विद्यार्थियों, अभिभावकों और नागरिक समाज से जुड़े लोगों की उल्लेखनीय भागीदारी रही। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि बालिकाओं की शिक्षा केवल व्यक्तिगत उन्नति का साधन नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक परिवर्तन की बुनियाद है।

राष्ट्रीय बालिका दिवस: राष्ट्र निर्माण की एक अनिवार्य प्रक्रिया है

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रख्यात शिक्षाविद, लेखक और सामाजिक चिंतक डॉ. बीरबल झा ने कहा कि भारत की सामाजिक और आर्थिक प्रगति की दिशा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि देश बालिकाओं को किस तरह की शिक्षा देता है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बालिकाओं को शिक्षित करना किसी तरह का उपकार नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की एक अनिवार्य प्रक्रिया है।

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डॉ. झा ने कहा, “किसी बालिका को शिक्षित करना दया का कार्य नहीं है। यह राष्ट्र के भविष्य में किया गया निवेश है। जब एक बालिका शिक्षित होती है, तो उसका असर केवल उसके जीवन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों तक जाता है।”

राष्ट्रीय बालिका दिवस: शिक्षा का असली मतलब निर्णय लेने की क्षमता

उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई कि आज भी शिक्षा को अक्सर केवल डिग्री और रोजगार से जोड़कर देखा जाता है, जबकि उसका उद्देश्य कहीं व्यापक होना चाहिए। उनके अनुसार, शिक्षा का असली मतलब गरिमा, आत्मविश्वास और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता विकसित करना है।

डॉ. झा ने कहा, “शिक्षा सिर्फ प्रमाणपत्रों का नाम नहीं है। यह अपनी बात कहने की ताकत, विकल्प चुनने की स्वतंत्रता और आत्मविश्वास का निर्माण करती है। सच्ची शिक्षा बालिकाओं को अनुयायी नहीं, बल्कि नेतृत्वकर्ता बनाती है।”

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अपने संबोधन में उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि संवैधानिक प्रावधानों और नीतिगत पहलों के बावजूद देश के कई हिस्सों में सामाजिक सोच और संरचनात्मक बाधाएं आज भी बालिकाओं की शिक्षा में बड़ी रुकावट बनी हुई हैं। उन्होंने कहा कि समस्या केवल संसाधनों या अवसरों की नहीं, बल्कि मानसिकता की है।

उन्होंने कहा, “आज की सबसे बड़ी चुनौती अवसरों की कमी नहीं, बल्कि दृष्टिकोण की कमी है। हमें यह आत्ममंथन करना होगा कि हम अपनी बेटियों को सच में उड़ान दे रहे हैं या केवल उनकी बेड़ियां थोड़ी ढीली कर रहे हैं।”

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डॉ. झा ने अंतरराष्ट्रीय शिक्षा दिवस और राष्ट्रीय बालिका दिवस का एक ही दिन पड़ना प्रतीकात्मक बताते हुए कहा कि यह संयोग हमें यह सोचने के लिए मजबूर करता है कि क्या हमारी शिक्षा नीतियों के केंद्र में वास्तव में बालिकाएं हैं। उनके मुताबिक, जब तक शिक्षा योजनाओं में बालिकाओं को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक समावेशी विकास का सपना अधूरा रहेगा

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उन्होंने शिक्षकों और शैक्षणिक संस्थानों से अपील की कि वे ऐसी शिक्षा पद्धतियों को अपनाएं, जो बालिकाओं में केवल अकादमिक ज्ञान ही नहीं, बल्कि संचार कौशल, आलोचनात्मक सोच, नैतिक मूल्यों और आत्मविश्वास का भी विकास करें। खासकर ग्रामीण और वंचित क्षेत्रों में इस दिशा में अधिक सजग प्रयासों की जरूरत बताई गई।

डॉ. झा ने सवाल उठाया, “आज असली सवाल यह नहीं है कि हम बालिकाओं को शिक्षा दे सकते हैं या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या भारत बालिकाओं को शिक्षित किए बिना आगे बढ़ सकता है?

संगोष्ठी के दौरान वक्ताओं ने इस बात पर भी सहमति जताई कि बालिकाओं की शिक्षा में किया गया निवेश केवल सामाजिक न्याय का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह आर्थिक विकास, स्वास्थ्य सुधार और लोकतांत्रिक मजबूती से भी सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है।

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कार्यक्रम का समापन इस सामूहिक संकल्प के साथ हुआ कि एक समावेशी, प्रगतिशील और विकसित भारत के निर्माण के लिए बालिकाओं की शिक्षा को प्राथमिकता दी जाएगी और इसके लिए समाज, सरकार और शैक्षणिक संस्थानों को मिलकर निरंतर प्रयास करने होंगे।

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