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HHRS International Conference 2026: विश्वबंधुत्व से भारत की वैश्विक भूमिका का संदेश

HHRS International Conference 2026: छठा हिमालय–हिंद महासागर राष्ट्र समूह (HHRS) अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन 2026 में उपस्थित अतिथि।

HHRS International Conference 2026: भारतीय संस्कृति की मूल चेतना “विश्वबंधुत्व” और “वसुधैव कुटुम्बकम्” के सिद्धांत में निहित है, जो भारत को वैश्विक मंच पर एक नैतिक और संतुलित शक्ति के रूप में स्थापित करती है। यह विचार जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), नई दिल्ली में आयोजित दो दिवसीय छठे हिमालय–हिंद महासागर राष्ट्र समूह (HHRS) अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन 2026 के समापन सत्र में प्रमुख रूप से उभरकर सामने आया।

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HHRS International Conference 2026: भारतीय संस्कृति को जीवन दर्शन बताया

समापन समारोह की अध्यक्षता करते हुए जामिया मिल्लिया इस्लामिया के रजिस्ट्रार और वरिष्ठ शिक्षाविद प्रो. (डॉ.) मोहम्मद महताब आलम रिज़वी ने कहा कि भारतीय संस्कृति में विश्वबंधुत्व कोई वैचारिक नारा नहीं, बल्कि एक अंतर्निहित जीवन-दर्शन है। उन्होंने कहा कि भारत पूरी दुनिया को एक परिवार के रूप में देखने की परंपरा में विश्वास करता है और यही दृष्टि उसे वैश्विक संघर्षों के बीच शांति और संतुलन का मार्ग दिखाने में सक्षम बनाती है।

प्रो. रिज़वी ने कहा कि यदि समाज आपसी सम्मान, सहयोग और संवेदनशीलता को अपनाए, तो हिंसा और टकराव स्वतः समाप्त हो सकते हैं। उन्होंने पारिवारिक रिश्तों का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार भाई-बहन एक-दूसरे की सुरक्षा और भलाई की कामना करते हैं, उसी प्रकार राष्ट्रों के बीच मानवीय संबंध वैश्विक शांति की मज़बूत नींव रख सकते हैं।

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उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि भारत ने ऐतिहासिक रूप से शक्ति-प्रदर्शन की बजाय संतुलन, सह-अस्तित्व और संवाद को प्राथमिकता दी है। ऐसे समय में जब दुनिया भू-राजनीतिक तनावों, युद्धों और आर्थिक अनिश्चितताओं से जूझ रही है, भारत शांति, स्थिरता और समानता पर आधारित एक वैकल्पिक वैश्विक दृष्टि प्रस्तुत कर रहा है।

प्रो. महताब आलम रिज़वी ने एक अहम सवाल भी उठाया—क्या भारत और दुनिया अपनी वास्तविक सॉफ्ट पावर, यानी संस्कृति, भाषा, कूटनीति और सभ्यतागत मूल्यों से दोबारा जुड़ने को तैयार हैं? उन्होंने कहा कि वैश्विक मंच पर सम्मान केवल सैन्य या आर्थिक ताकत से नहीं, बल्कि नैतिकता, मूल्यों और सांस्कृतिक आत्मविश्वास से अर्जित होता है। दूसरों की अंधी नकल से अपनी विशिष्ट पहचान खोने का खतरा हमेशा बना रहता है।

यह सम्मेलन हिमालय–हिंद महासागर राष्ट्र समूह (HHRS) और राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच (RSJM) द्वारा आयोजित किया गया था। इसमें सेंटर ऑफ रशियन स्टडीज़ (CRS), स्कूल ऑफ लैंग्वेज, लिटरेचर एंड कल्चर स्टडीज़ (SLL&CS), इंटर-हॉल एडमिनिस्ट्रेशन (IHA), JNU, नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कॉन्फ्लिक्ट रेज़ोल्यूशन (जामिया मिलिया इस्लामिया) और सेंटर फॉर हिमालयन स्टडीज़ (दिल्ली विश्वविद्यालय) का सहयोग रहा। सम्मेलन का केंद्रीय विषय था— “इंडियन ओशन रीजन में इंडिया का जियोपॉलिटिकल और स्ट्रेटेजिक महत्व।”

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HHRS International Conference 2026: हिंद महासागर क्षेत्र और भारत की बढ़ती भूमिका

समापन सत्र में वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत तेज़ी से सशक्त हुआ है और आज वैश्विक निर्णय-प्रक्रियाओं में भारत को गंभीरता से सुना जाता है। उन्होंने कहा कि हिंद महासागर क्षेत्र रणनीतिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

India Global Role: सभ्यताओं के बीच सांस्कृतिक संवाद

अवधेश कुमार ने बताया कि हिंद महासागर क्षेत्र लगभग 68 मिलियन वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है और वैश्विक समुद्री व्यापार की लाइफलाइन माना जाता है। दुनिया के करीब 80 प्रतिशत समुद्री व्यापार का आवागमन इसी क्षेत्र से होता है। उन्होंने कहा कि प्राचीन काल में भारत का समुद्री व्यापार पूर्वी अफ्रीका, अरब देशों और दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैला हुआ था, जिसने सभ्यताओं के बीच सांस्कृतिक संवाद को मजबूत किया।

उन्होंने यह भी कहा कि जहां औपनिवेशिक शक्तियां व्यापारिक मार्गों और संसाधनों पर नियंत्रण के लिए प्रतिस्पर्धा करती थीं, वहीं स्वतंत्र भारत ने अपनी समुद्री क्षमताओं को सुदृढ़ करते हुए क्षेत्रीय सहयोग और संतुलन को प्राथमिकता दी।

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Indian Ocean Region: अन्य वक्ताओं की राय

JNU की डीन प्रोफेसर मनुराधा चौधरी ने कहा कि भारत का दृष्टिकोण हमेशा समावेशी और मानवीय मूल्यों पर आधारित रहा है। भारतीय व्यापारी और विद्वान केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने भाषा, संस्कृति, योग और दर्शन का भी प्रसार किया।

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बी. डब्ल्यू. पांडे ने कहा कि किसी भी सभ्यता की वास्तविक शक्ति संवाद की क्षमता में निहित होती है। भारतीय संस्कृति ने हमेशा संघर्ष के बजाय संवाद को प्राथमिकता दी है। विशेष अतिथि प्रोफेसर वी. रविचंद्रन, कुलपति, दिल्ली फार्मास्युटिकल साइंसेज़ एंड रिसर्च यूनिवर्सिटी, नई दिल्ली ने कहा कि हिंद महासागर केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि रणनीतिक केंद्रीयता का प्रतीक है, जो भारत को कूटनीतिक और रणनीतिक बढ़त देता है।

नेपाल स्थित मिड-ईस्ट यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रोफेसर ध्रुबा कुमार ने कहा कि भारत की असली शक्ति उसकी संस्कृति, दर्शन और आध्यात्मिक चेतना में निहित है। भारत को केवल एक राष्ट्र-राज्य नहीं, बल्कि एक जीवंत सभ्यता के रूप में समझा जाना चाहिए।

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अकादमिक सत्र और निष्कर्ष

सम्मेलन के दौरान कई अकादमिक और पैरेलल सत्र आयोजित किए गए, जिनमें 100 से अधिक शोधकर्ताओं और विद्वानों ने भाग लिया। “भारत और हिंद महासागर क्षेत्र: चुनौतियां और समाधान” तथा “उभरते रुझान और संभावनाएं” जैसे विषयों पर गहन विचार-विमर्श हुआ। सम्मेलन का समापन “ब्रेनस्टॉर्मिंग सेशन: आगे का रास्ता” के साथ हुआ।

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