Mark Tully death: दुनिया के प्रतिष्ठित पत्रकार मार्क टुली का निधन केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि यह पत्रकारिता के एक पूरे युग का अवसान है। वे ऐसे विरले पत्रकार थे जिन्होंने भारत को केवल बाहर से नहीं देखा, बल्कि भीतर तक महसूस किया, समझा और जिया। भारत उनकी कर्मभूमि ही नहीं, उनकी आत्मभूमि बन गया था। उनकी लेखनी में भारत की आत्मा बोलती थी—उस भारत की, जो गांवों, गलियों, आस्थाओं, विरोधाभासों और उम्मीदों से बना है।
Mark Tully death: सवाल पूछते थे—बिना शोर के
मार्क टुली ने पत्रकारिता को महज़ खबरों का संकलन नहीं रहने दिया, बल्कि उसे संवेदना, सत्य और सरोकार का सशक्त माध्यम बनाया। बीबीसी के माध्यम से उन्होंने दशकों तक भारत की राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक हलचलों को दुनिया के सामने रखा, लेकिन उनकी प्रस्तुति कभी बाहरी दृष्टि से थोपी हुई नहीं लगी। उनके शब्दों में अपनापन था, ठहराव था और सबसे बढ़कर ईमानदारी थी। वे सवाल पूछते थे—बिना शोर के; सच कहते थे—बिना कटुता के।
उनकी रिपोर्टिंग की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे सत्ता से अधिक समाज को सुनते थे। आम आदमी की पीड़ा, ग्रामीण भारत की जटिलताएं, लोकतंत्र की चुनौतियां और धर्म-आस्था की बहुरंगी छवियां—सब कुछ उनकी पत्रकारिता का हिस्सा था। उन्होंने यह साबित किया कि पत्रकार का काम केवल घटनाओं का वर्णन करना नहीं, बल्कि उनके निहितार्थों को समझाना भी है।
Mark Tully death: कुंभ से लेकर अयोध्या आंदोलन तक
मार्क टुली की पत्रकारिता भारत के कई निर्णायक ऐतिहासिक क्षणों की साक्षी रही। प्रयागराज के महाकुंभ मेले को उन्होंने केवल धार्मिक आयोजन के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय समाज की सामूहिक चेतना, अनुशासन और विविधता के विराट प्रदर्शन के रूप में देखा। अयोध्या आंदोलन के दौरान उनकी रिपोर्टिंग किसी एक पक्ष की पक्षधर नहीं थी, बल्कि उसके दूरगामी सामाजिक और राजनीतिक प्रभावों को समझाने का प्रयास थी, जिसे वे भारतीय लोकतंत्र की एक जटिल परीक्षा मानते थे।
1975 के आपातकाल में वे उन चुनिंदा विदेशी पत्रकारों में रहे जिन्होंने नागरिक स्वतंत्रताओं पर लगे प्रतिबंधों को गंभीरता से दर्ज किया और लोकतंत्र पर पड़े उसके असर को रेखांकित किया। वहीं 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद, उनकी रिपोर्टों में सत्ता के शोक के साथ-साथ समाज में फैलते भय, अविश्वास और टूटते सामाजिक ताने-बाने की स्पष्ट झलक मिलती है।
Mark Tully death: भारत को अपना देश बनाया
मार्क टुली भारत को पश्चिमी चश्मे से नहीं देखते थे। उन्होंने भारतीय लोकतंत्र, राजनीति और समाज को उसकी अपनी शर्तों पर समझने की कोशिश की। शायद यही कारण है कि वे भारत में उतने ही सम्मान के पात्र थे, जितने अपने देश में। उनकी चर्चित कृतियां—India in Slow Motion, The Heart of India, Amritsar: Mrs Gandhi’s Last Battle—आज भी भारत को समझने के लिए संदर्भ ग्रंथों की तरह पढ़ी जाती हैं।
एक विदेशी होकर भी वे भारतीय संवेदनाओं के इतने निकट थे कि कई बार वे “विदेशी पत्रकार” नहीं, बल्कि “भारत का अपना पत्रकार” लगते थे। उनकी भाषा में संयम था, दृष्टि में गहराई थी और सोच में संतुलन। आज के तेज़-तर्रार, सनसनी-प्रधान मीडिया के दौर में उनकी पत्रकारिता एक नैतिक मानक की तरह याद की जाएगी।
मार्क टुली का जाना पत्रकारिता की उस परंपरा को और अधिक विरल कर गया है, जिसमें धैर्य, शोध, संवेदना और सत्य के प्रति निष्ठा सर्वोपरि थी। वे आने वाली पीढ़ियों के पत्रकारों के लिए सदैव प्रेरणा स्रोत बने रहेंगे—यह सिखाने के लिए कि सच्ची पत्रकारिता शोर में नहीं, समझ में होती है।
आज जब हम उन्हें अंतिम विदाई देते हैं, तो शब्द कम पड़ जाते हैं। लेकिन उनकी विरासत, उनकी सोच और उनकी लेखनी सदैव जीवित रहेगी।
प्रख्यात शिक्षाविद, लेखक और सामाजिक चिंतक डॉ. बीरबल झा ने भी सर मार्क टुली के निधन पर श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा:
“जाने-माने पत्रकार और लेखक सर मार्क टुली के निधन पर मैं गहरी संवेदना व्यक्त करता हूँ। मुझे 2005 में दिल्ली में उनके घर पर उनसे पहली बार मिलने का सौभाग्य मिला था। वह बहुत ही विनम्र और अनुशासित व्यक्ति थे। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे।”
मार्क टुली लंबे समय तक बीबीसी के दिल्ली ब्यूरो प्रमुख रहे और भारत में दशकों तक सक्रिय पत्रकारिता की। उनकी रिपोर्टिंग ने अंतरराष्ट्रीय पाठकों को भारतीय समाज की जमीनी वास्तविकताओं से परिचित कराया। मार्क टुली को विनम्र श्रद्धांजलि—एक पत्रकार को, एक सेतु को, और भारत के एक सच्चे मित्र को।
(साभार: वरिष्ठ पत्रकार विश्वनाथ झा के फ़ेसबुक वॉल से)
CMARG (Citizen Media And Real Ground) is a research-driven media platform that focuses on real issues, timely debates, and citizen-centric narratives. Our stories come from the ground, not from the studio — that’s why we believe: “Where the Ground Speaks, Not the Studios.” We cover a wide range of topics including environment, governance, education, economy, and spirituality, always with a public-first perspective. CMARG also encourages young minds to research, write, and explore bold new ideas in journalism.
