Vikas Kumar Jha: समकालीन हिंदी पत्रकारिता और साहित्य के विस्तृत परिदृश्य में कुछ ही नाम ऐसे हैं जो केवल समाचारों या रचनाओं का सृजन नहीं करते, बल्कि अपने समय की नैतिक चेतना को भाषा का आकार देते हैं। वे घटनाओं को सतही विवरण में नहीं बांधते, बल्कि उनके भीतर धड़कते प्रश्नों, टकरावों और अंतर्विरोधों को शब्दों में रूपांतरित करते हैं। सत्ता के चमकदार गलियारों से लेकर हाशिए पर खड़े जीवन की खामोश पीड़ा तक, इतिहास की गहरी परतों से लेकर वर्तमान की बेचैनी तक हर जगह समान संवेदनशीलता, वैचारिक स्पष्टता और नैतिक साहस के साथ उपस्थित रहने वाले ऐसे ही रचनाकार हैं विकास कुमार झा।
Vikas Kumar Jha: सूचना से आगे बढ़कर विवेक का निर्माण
झा का रचनात्मक व्यक्तित्व किसी एक विधा की सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता। वे पत्रकार हैं, पर केवल खबर लिखने वाले नहीं; लेखक हैं, पर महज कल्पना के सहारे चलने वाले नहीं; और साहित्यकार हैं, पर समाज से कटे हुए भी नहीं। उनकी रचनात्मक यात्रा पत्रकारिता की ठोस जमीन से आरंभ होकर साहित्य की ऊंचाइयों तक पहुंचती है और फिर समाज के जीवंत यथार्थ में लौट आती है। पत्रकार, लेखक और साहित्यकार के रूप में उनकी पहचान बहुआयामी है, किंतु इन सभी भूमिकाओं को जोड़ने वाला केंद्रीय सूत्र है जवाबदेह लेखन। उनकी लेखनी सूचना से आगे बढ़कर विवेक का निर्माण करती है और पाठक को निष्क्रिय उपभोक्ता नहीं, बल्कि विचारशील सहभागी में रूपांतरित कर देती है।
Vikas Kumar Jha: पत्रकारिता और साहित्य के बीच नैतिक सेतु
विकास कुमार झा उन विरल रचनाकारों में हैं जो पत्रकारिता और साहित्य के बीच खींची गई कृत्रिम विभाजन-रेखा को स्वीकार नहीं करते। उनके लिए पत्रकारिता तत्काल का साहित्य है और साहित्य दीर्घकालीन पत्रकारिता। यही कारण है कि उनकी रिपोर्टिंग में कथा का प्रवाह है और उनकी कथाओं में तथ्य की ठोस जमीन। ‘माया’, ‘आउटलुक’ और ‘रविवार’ जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित उनकी चर्चित स्टोरियां इस बात का प्रमाण हैं कि वे विषय को सतह पर नहीं, उसकी जड़ों तक जाकर पकड़ते हैं।
उनका लेखन सत्ता और समाज के बीच संवाद का माध्यम बनता है। जहां प्रश्न भी हैं, और उत्तर खोजने की बेचैनी भी। उनकी भाषा न तो शुष्क तथ्यानुशासन में कैद है और न ही भावुकता की अतिशयता में बहती हुई। वह संयत है, पर तीखी; सौम्य है, पर प्रतिरोधी। यह भाषा सत्ता से सवाल करती है और समाज से आत्मालोचन की अपेक्षा भी।

Vikas Kumar Jha: सच के पक्ष में निर्भीक हस्तक्षेप
पत्रकार के रूप में विकास कुमार झा ने जिस क्षेत्र को सबसे गहराई से समझा है, वह है सत्ता, राजनीति और उनके सामाजिक प्रभाव। उनकी रिपोर्टिंग का केंद्र कभी तात्कालिक लाभ-हानि या सनसनी नहीं रहा, बल्कि लोकतांत्रिक संरचनाओं की गहन पड़ताल रही है। वे खबर को ‘ब्रेक’ नहीं करते, बल्कि उसे खोलते हैं। उसके भीतर छिपे संदर्भ, संरचनाएं और निहित स्वार्थ उजागर करते हैं। उनकी पत्रकारिता में शोर नहीं, ठहराव है; सनसनी नहीं, विवेक है। यही ठहराव पाठक को सोचने पर विवश करता है और खबर को टिकाऊ अर्थ प्रदान करता है।
‘बिहार राजनीति का अपराधीकरण’: लोकतंत्र का निष्ठुर यथार्थ
यह पुस्तक केवल बिहार की राजनीति का विश्लेषण नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के उस अंधेरे गलियारे का दस्तावेज़ है जहां अपराध और सत्ता एक-दूसरे के पूरक बन जाते हैं। विकास कुमार झा यहां किसी व्यक्ति या दल को निशाना नहीं बनाते, बल्कि उस संरचना को प्रश्नांकित करते हैं जो अपराध को सत्ता का वैध उपकरण बना देती है। इस कृति का महत्व इसके निर्भीक तथ्यों, शोधपरक दृष्टि और संतुलित विवेचन में निहित है। लेखक न तो नैतिक उपदेशक बनता है और न ही निराशावादी। वह सच को उसकी पूरी कठोरता के साथ पाठक के सामने रख देता है।
‘सत्ता का सूत्रधार’: परदे के पीछे की राजनीति
‘सत्ता का सूत्रधार’ सत्ता की उन अदृश्य शक्तियों की कथा है जो मंच पर दिखाई नहीं देतीं, लेकिन पूरे नाटक की पटकथा उन्हीं के हाथों में होती है। यह पुस्तक लोकतंत्र की चमकदार भाषा के पीछे सक्रिय छाया-राजनीति को उजागर करती है। यहां सत्ता के सूत्रधार व्यक्ति नहीं, बल्कि प्रवृत्तियां बनकर सामने आते हैं ,जिससे यह कृति केवल अपने समय तक सीमित नहीं रहती, बल्कि समयातीत अर्थ ग्रहण कर लेती है।
‘मैकलुस्कीगंज’: स्मृति, इतिहास और विस्थापन
‘मैकलुस्कीगंज’ विकास कुमार झा की सबसे चर्चित और विशिष्ट कृतियों में गिनी जाती है। यह केवल एक कस्बे का इतिहास नहीं, बल्कि स्मृति, विस्थापन और पहचान की गहन कथा है। लेखक यहां इतिहासकार की तरह तथ्य जुटाता है और कथाकार की तरह उन्हें जीवन देता है। भाषा में एक सूक्ष्म उदासी है, लेकिन वह उदासी निष्क्रिय नहीं, बल्कि प्रश्नाकुल है। यह पुस्तक बताती है कि इतिहास केवल अतीत नहीं होता, वह वर्तमान में भी सांस लेता है।
Vikas Kumar Jha: प्रकृति, लोक जीवन और मानवीय आशा
‘वर्षावन’, ‘सोन मच्छरिया’ और ‘उल्लास की नाव’ में विकास कुमार झा का एक अलग, अधिक संवेदनशील रूप सामने आता है। इन कृतियों में प्रकृति पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि सक्रिय पात्र है संघर्षरत, जीवंत और पीड़ित।‘वर्षावन’ वन-संस्कृति और पर्यावरणीय संकट की कथा कहती है, ‘सोन मच्छरिया’ लोकजीवन की संघर्षशील गरिमा का रूपक है, जबकि ‘उल्लास की नाव’ मानवीय जिजीविषा और आशा की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति।
‘गयासुर संधान’: मिथक और आधुनिक चेतना का संवाद
इस कृति में लेखक मिथक को केवल आस्था के रूप में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति के रूप में पढ़ते हैं। ‘गयासुर संधान’ यह दिखाती है कि प्राचीन कथाएं आधुनिक समाज के प्रश्नों से कैसे संवाद कर सकती हैं। यहां इतिहास, धर्म और समाजशास्त्र के बीच एक संतुलित और विचारोत्तेजक सेतु निर्मित होता है।
Vikas Kumar Jha: भाषा, शिल्प और दृष्टि
विकास कुमार झा की भाषा प्रवाहपूर्ण, ओजस्वी और अलंकारिक है, किंतु अनावश्यक क्लिष्टता से मुक्त। वे शब्दों को सजाते नहीं, अर्थ को सघन बनाते हैं। उनका शिल्प विषय के अनुसार बदलता है। कहीं रिपोर्ट की तटस्थता, कहीं कथा की संवेदनात्मक ऊष्मा।
Vikas Kumar Jha: संयम, साहस और वैचारिक स्पष्टता
एक व्यक्ति के रूप में विकास कुमार झा न तो आत्म प्रचार के आकांक्षी हैं और न ही वैचारिक कट्टरता के। उनका साहस शोर में नहीं, निरंतरता में है। वे मानते हैं कि लेखन केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समय के प्रति जवाबदेही है। आज जब पत्रकारिता तात्कालिकता और साहित्य आत्ममुग्धता के संकट से गुजर रहा है, विकास कुमार झा की उपस्थिति विशेष महत्व रखती है। वे याद दिलाते हैं कि लेखन का उद्देश्य केवल पढ़ा जाना नहीं, बल्कि समझा जाना है। उनकी रचनाएं भविष्य के लिए यह साक्ष्य छोड़ती हैं कि इस समय में भी कुछ लोग थे, जो सच के साथ खड़े थे शांत, स्पष्ट और अडिग।