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YEAR-ENDER 2025: बिहार में विकास की सियासत भारी, भ्रम का नैरेटिव बेअसर

YEAR-ENDER 2025: साल 2025 बिहार की राजनीति के लिए महत्वपूर्ण वर्ष रहा।

YEAR-ENDER 2025: बिहार की राजनीति में एक बार फिर इतिहास ने निर्णायक करवट ली है। विधानसभा चुनाव के जनादेश ने स्पष्ट और निर्विवाद रूप से यह प्रमाणित कर दिया है कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) केवल सत्ता का अंकगणित साधने वाला राजनीतिक गठजोड़ नहीं, बल्कि जन-आकांक्षाओं की नब्ज को समझने और दिशा देने वाला एक सशक्त, संगठित और विश्वसनीय मंच है। यह विजय महज सीटों की संख्या का आंकड़ा भर नहीं, बल्कि जनता के भरोसे, सुदृढ़ नेतृत्व और मजबूत संगठनात्मक संरचना की सामूहिक शक्ति का जीवंत साक्ष्य है।

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YEAR-ENDER 2025: एनडीए ने 202 सीटों के साथ प्रचंड जीत हासिल की, विपक्ष परास्त हुआ

इस चुनाव में जहां एनडीए ने 202 सीटों के साथ प्रचंड जनादेश प्राप्त किया, वहीं महागठबंधन 35 सीटों और अन्य दल मात्र 6 सीटों तक सिमटकर रह गए। इस ऐतिहासिक विजय गाथा के केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की वह प्रभावशाली त्रिवेणी उभरकर सामने आई, जिसकी संयुक्त धार ने विपक्ष की राजनीतिक दलीलों, रणनीतियों और भ्रमपूर्ण नैरेटिव को पूरी तरह चारों खाने चित कर दिया।

YEAR-ENDER 2025: बिहार को आत्मनिर्भरता, रोजगार, कल्याण और सुशासन की राह दिखाई

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस चुनाव में एनडीए के नैतिक, वैचारिक और प्रेरक ध्वजवाहक के रूप में सामने आए। उनकी जनसभाओं में “विकास, विश्वास और भविष्य” का स्वर केवल नारा नहीं, बल्कि एक स्पष्ट दृष्टि के रूप में गूंजता रहा। मोदी ने बिहार को अतीत की सीमाओं में बांधने के बजाय संभावनाओं के विस्तृत मानचित्र पर प्रतिष्ठित किया। आत्मनिर्भर भारत का संकल्प, गरीब कल्याण की योजनाएं, बुनियादी ढांचे का विस्तार, रोजगार सृजन और सुशासन, ये सभी उनके एजेंडे के ठोस स्तंभ रहे। राष्ट्रीय दृष्टि को स्थानीय आवश्यकताओं से जोड़ने की उनकी क्षमता ने शहरी मतदाता से लेकर ग्रामीण समाज तक भरोसे की मजबूत सेतु निर्मित की।

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इस ऐतिहासिक विजय के रणनीतिक शिल्पकार के रूप में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की भूमिका निर्णायक रही। संगठनात्मक अनुशासन की सुदृढ़ संरचना, बूथ-स्तर तक पहुंचने वाला सूक्ष्म चुनावी प्रबंधन और गठबंधन की जटिल रसायन शास्त्र इन तीनों पर उनकी पकड़ इतनी सटीक रही कि चुनावी रणभूमि में हर कदम निर्णायक सिद्ध हुआ। शाह ने चुनाव को भावनात्मक उभार तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे योजनाबद्ध रणनीति का अनुशासित अभियान बनाया। कार्यकर्ताओं की ऊर्जा को दिशा देना, नेतृत्व के बीच संतुलन साधना और घटक दलों के बीच संवाद की समरस लय स्थापित करना। इन सबने मिलकर एनडीए के संदेश को नारे से आगे बढ़ाकर जनमानस की आवाज में बदल दिया।

YEAR-ENDER 2025: स्थिरता को प्राथमिकता दी और अनिश्चित प्रयोगों से दूरी बनाए रखी

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस प्रचंड जीत के प्रशासनिक और नैतिक स्तंभ के रूप में स्थापित हुए। बिहार की जनता ने उनके शासनकाल में सड़क, बिजली, शिक्षा और कानून-व्यवस्था में आए व्यावहारिक बदलावों को प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर परखा है। नीतीश कुमार की राजनीति प्रदर्शन से नहीं, परिणाम से बोलती है। इस चुनाव में उन्होंने विकास की निरंतरता और सामाजिक संतुलन को केंद्रीय मुद्दा बनाया। उनकी छवि एक ऐसे नेतृत्व की रही, जो सत्ता को साधन मानकर नहीं, बल्कि सेवा के माध्यम के रूप में देखता है। यही कारण रहा कि मतदाताओं ने स्थिरता को प्राथमिकता दी और अनिश्चित प्रयोगों से दूरी बनाए रखी। 

एनडीए की यह विजय गठबंधन की राजनीतिक परिपक्वता का भी सशक्त प्रमाण है। प्रधानमंत्री मोदी की करिश्माई अपील ने व्यापक जनसमर्थन जुटाया, अमित शाह की रणनीति ने उसे संगठित दिशा दी और नीतीश कुमार की प्रशासनिक विश्वसनीयता ने आधार को मजबूती प्रदान की। राष्ट्रीय दृष्टि, संगठनात्मक दक्षता और स्थानीय नेतृत्व के इस त्रिकोणीय संतुलन ने एनडीए को अजेय बढ़त दिलाई।

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विपक्ष के लिए यह परिणाम आत्ममंथन का अवसर बनकर सामने आया है। मुद्दों की बिखरी हुई प्रस्तुति, नेतृत्व की अस्पष्टता और ठोस वैकल्पिक विकास मॉडल के अभाव ने उन्हें जनादेश से दूर कर दिया। इसके विपरीत, एनडीए ने सकारात्मक और परिणामोन्मुख एजेंडा प्रस्तुत किया। कल्याणकारी योजनाओं की निरंतरता, युवाओं के लिए अवसर, महिलाओं के सशक्तिकरण और आधारभूत ढांचे का विस्तार। चुनावी विमर्श में नकारात्मकता के स्थान पर आशा और भरोसे की भाषा बोली गई, जिसे जनता ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया।

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इस जीत के सामाजिक निहितार्थ भी गहरे हैं। बिहार की जनता ने यह संकेत दिया है कि वह स्थिर शासन, पारदर्शिता और परिणाम आधारित राजनीति चाहती है। जातीय समीकरणों से ऊपर उठकर विकास को मतदान का केंद्र बनाना लोकतांत्रिक चेतना की परिपक्वता को दर्शाता है। एनडीए ने इस बदलते सामाजिक मनोविज्ञान को समझा और अपने संदेश को उसी अनुरूप ढाला।

YEAR-ENDER 2025: जनादेश जितना प्रचंड है, अपेक्षाएं उतनी ही ऊंची

आगे की राह अवसरों और जिम्मेदारियों से भरी है। जनादेश जितना प्रचंड है, अपेक्षाएं उतनी ही ऊंची हैं। रोजगार सृजन, औद्योगिक निवेश, कृषि आधुनिकीकरण, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता तथा सामाजिक समरसता,ये वे क्षेत्र हैं जहां सरकार को तीव्र और ठोस परिणाम देने होंगे। प्रधानमंत्री मोदी की राष्ट्रीय योजनाएं, अमित शाह की संगठनात्मक दृढ़ता और नीतीश कुमार का प्रशासनिक अनुभव यदि इसी समन्वय में आगे बढ़ता है, तो बिहार विकास के नए अध्याय रच सकता है।

अंततः यह विजय किसी एक चेहरे की नहीं, बल्कि साझा नेतृत्व, सशक्त संगठन और जनता के अटूट भरोसे की जीत है। बिहार ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि वह भविष्य चाहता है और एनडीए को उस भविष्य का विश्वसनीय वाहक मानता है। यह जनादेश एक अवसर है, सेवा, समर्पण और सुशासन के संकल्प को कर्म में बदलकर जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने का।

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(साभार प्रसार भारती)

लेखक प्रसार भारती में वरिष्‍ठ पत्रकार हैं।

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