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बीज की आजादी से ग्राम स्वराज तक: महात्मा गांधी के सपनों की खेती की राह

Beej Ki Azadi: किसान के हाथों में संभाले गए बीज खेती की आजादी और आत्मनिर्भरता का प्रतीक हैं।

विकास कुमार झा

Beej Ki Azadi: गांधी जयंती पर गांधी को याद करने का एक रास्ता अपने गांव और खेत की तरफ देखना भी है। गांधी के लिए स्वराज सिर्फ सत्ता बदलने का नाम नहीं था। स्वराज का मतलब था अपने जीवन से जुड़े जरूरी फैसले खुद लेने की ताकत। किसान के लिए इससे बड़ा सवाल और क्या होगा कि वह क्या बोएगा, कौन-सा बीज बोएगा और अपने बीज के लिए किस पर निर्भर रहेगा?

यहीं से कुदरती खेती और ग्राम स्वराज का रिश्ता शुरू होता है। खेती की आजादी की पहली शर्त बीज की आजादी है। जिस किसान को हर मौसम बीज खरीदना पड़े, उसकी खेती बाजार पर निर्भर होती जाती है। इसके उलट, किसान अपने बीज को बचाता, संभालता और अगली फसल के लिए तैयार करता है तो उसके हाथ में एक महत्वपूर्ण स्वायत्तता आती है।

बिहार के गांवों में बीज बचाने की एक पुरानी परंपरा रही है। घर की महिलाएं बीज संभालती थीं। किसान स्थानीय किस्मों को पहचानता था। धान, गेहूं, दलहन, तिलहन और सब्जियों की अनेक किस्में मिट्टी और मौसम के साथ विकसित हुई थीं। हर बीज के पीछे सिर्फ खेती का अनुभव नहीं था। उसके साथ स्वाद था। भोजन था। लोक-स्मृति थी। और कई पीढ़ियों का ज्ञान था।

आज बहुत-सी स्थानीय किस्में धीरे-धीरे गायब हो रही हैं। बाजार में उपलब्ध सीमित किस्मों पर निर्भरता बढ़ रही है। इसके साथ खेती की जैव विविधता भी कम होती है। इसलिए बीज संरक्षण सिर्फ पुरानी किस्मों को बचाने का काम नहीं है। यह किसान की स्वायत्तता और हमारी खाद्य सुरक्षा का सवाल भी है।

Beej Ki Azadi: अपनों पर भरोसा स्वदेशी भावना का सबसे ठोस रूप है

गांधी का स्वदेशी यहां बहुत प्रासंगिक हो जाता है। अपने संसाधनों पर भरोसा। अपने श्रम पर भरोसा। अपने स्थानीय ज्ञान पर भरोसा। और सबसे बढ़कर, अपनी जरूरतों के बारे में खुद फैसला लेने का अधिकार। किसान का अपना बीज इसी स्वदेशी भावना का सबसे ठोस रूप हो सकता है।

कुदरती खेती भी इसी स्वायत्तता को मजबूत करती है। स्थानीय बीज स्थानीय मिट्टी और मौसम के साथ विकसित होते हैं। खेत में फसल विविधता बढ़ती है। किसान बाहरी इनपुट पर अपनी निर्भरता कम कर सकता है। खेती फिर सिर्फ बाजार के लिए उत्पादन करने का काम नहीं रहती। वह गांव की खाद्य और आर्थिक सुरक्षा का आधार बन सकती है।

चंपारण की धरती से लेकर आज के बिहार के गांवों तक, किसान की आजादी का सवाल अलग-अलग रूपों में हमारे सामने रहा है। आज उस आजादी का एक महत्वपूर्ण सवाल बीज का है। बीज किसके पास है? बीज पर फैसला कौन करता है? और अगली फसल के लिए किसान कितना स्वतंत्र है? यह सब महत्वपूर्ण है।

स्वदेशी खेती: हर गांव में स्थानीय बीजों की पहचान शुरू हो

इस बार महात्मा गांधी जयंती पर सिर्फ सवाल पूछकर रुकना नहीं चाहिए। हर गांव में स्थानीय बीजों की पहचान शुरू हो। किसान अपने घर के अच्छे बीज अलग करके सुरक्षित रखें। गांव में सामुदायिक बीज बैंक बनें। किसान आपस में बीज का आदान-प्रदान करें। स्कूलों और पंचायतों के स्तर पर स्थानीय बीजों का दस्तावेज तैयार हो। कृषि विभाग और कृषि विश्वविद्यालय किसानों के साथ मिलकर देशी और स्थानीय किस्मों के संरक्षण पर काम करें। और हर किसान परिवार कम-से-कम एक स्थानीय किस्म को बचाने का संकल्प ले।

यह छोटा काम दिखाई दे सकता है। लेकिन इसकी शुरुआत बहुत बड़ी है। क्योंकि बीज सिर्फ अगली फसल की शुरुआत नहीं है। वह किसान की स्वायत्तता की शुरुआत भी है। इस बार गांधी जयंती पर एक बीज बचाइए। उसे सुरक्षित रखिए। दूसरे किसान से बांटिए। अगली पीढ़ी तक पहुंचाइए। बीज पर किसान का अधिकार बचेगा, तभी खेती की आजादी बचेगी। खेती की आजादी बचेगी, तभी ग्राम स्वराज की बुनियाद मजबूत होगी।

लेखक विकास कुमार झा, वरिष्‍ठ पत्रकार, साहित्‍यकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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