सारिका झा
मिथिला की पावन ज्ञान-परंपरा और आधुनिक न्याय-चेतना के संगम पर एक ऐसी शख्सियत विराजमान है, जो सेवा, समर्पण और स्वाभिमान का जीवंत प्रतीक है। मंजू झा केवल एक अधिवक्ता नहीं, बल्कि संवेदनशील समाज की सजग प्रहरी, संस्कृति की संरक्षिका और परिवर्तन की मुखर आवाज हैं। पटना उच्च न्यायालय में विधि की गरिमा को सशक्त करते हुए, समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति के आंसू पोंछना उनके जीवन का ध्येय है। उनका समग्र व्यक्तित्व एक ऐसी प्रेरक गाथा है, जिसमें कर्म की निष्ठा, विचारों की प्रखरता और मिथिलांचल के प्रति अगाध प्रेम एक साथ प्रवाहित होता है। मूलतः दरभंगा ज़िले के खराजपुर की निवासी मंजू झा, अपने कार्यों के माध्यम से संस्कृति, समाज और संवेदना के बीच एक सशक्त सेतु का निर्माण कर रही हैं।
विदुषी अधिवक्ता : न्याय की साधना और जागरूकता की अलख
पटना उच्च न्यायालय में एक सशक्त अधिवक्ता के रूप में मंजू झा की पहचान केवल कानूनी तर्कों तक सीमित नहीं है, बल्कि वे न्याय को समाज के हर वर्ग तक पहुंचाने की प्रतिबद्ध साधिका हैं। जीएसटी जैसे जटिल विषय पर उनकी पुस्तकीय रचना उनके गहन अध्ययन, आर्थिक समझ और विधिक दक्षता का सशक्त प्रमाण है। उनके लिए कानून केवल दंड का विधान नहीं, बल्कि जन-जन के सशक्तिकरण का माध्यम है। यही कारण है कि वे समाज में कानूनी जागरूकता फैलाने की एक प्रखर पैरोकार के रूप में निरंतर सक्रिय हैं।
चेतना समिति की सारथी : संस्कृति और समाज के बीच सशक्त सेतु
‘चेतना समिति’ की उपाध्यक्ष के रूप में मंजू झा ने सांस्कृतिक पुनर्जागरण की एक सशक्त धारा प्रवाहित की है। उनके नेतृत्व में यह संस्था मात्र एक संगठन नहीं रह गई है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना का एक जीवंत आंदोलन बन चुकी है। मिथिलाक्षर का संवर्धन : विलुप्ति के कगार पर खड़ी मिथिलाक्षर लिपि के पुनर्जीवन और उसके संरक्षण हेतु उनका प्रयास अत्यंत सराहनीय है। वे इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाकर सांस्कृतिक अस्मिता को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
कला-शिल्प की साधिका : कला और शिल्प के प्रति उनकी गहरी अभिरुचि ने मिथिला की माटी की सोंधी सुगंध को व्यापक पहचान दिलाई है। उनके प्रयासों से पारंपरिक कला को नया आयाम और मंच मिला है। कलाकारों का उत्साहवर्धन : ‘चेतना समिति’ के माध्यम से वे मिथिला के कलाकारों को मंच प्रदान कर उनकी प्रतिभा को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने का सतत प्रयास कर रही हैं। उनके नेतृत्व में अनेक कलाकारों को नई पहचान और प्रोत्साहन मिला है।
मिथिला की ब्रांड एंबेसडर : परंपरा को वैश्विक पहचान
मंजू झा के लिए मिथिला केवल एक भौगोलिक सीमा नहीं, बल्कि एक जीवंत दर्शन है। वे मिथिला मखाना की पौष्टिकता और मिथिला पेंटिंग (मधुबनी कला) की सूक्ष्मता को देश-दुनिया तक पहुंचाने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं। विविध कार्यक्रमों और पहलों के माध्यम से वे परंपरा और आधुनिकता के बीच सेतु का कार्य कर रही हैं। उनके प्रयासों में सांस्कृतिक गौरव के साथ-साथ आर्थिक सशक्तिकरण की भी स्पष्ट झलक दिखाई देती है।
नारी शक्ति की अग्रदूत : सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध मुखर स्वर
समाज में व्याप्त कुरीतियों के विरुद्ध उनकी आवाज किसी वज्रनाद से कम नहीं है। दहेज प्रथा के खिलाफ संघर्ष : वे दहेज जैसी सामाजिक बुराई के विरुद्ध निर्भीकता से आवाज उठाकर समाज को जागृत करती हैं। महिला सशक्तिकरण और शिक्षा : बेटियों की शिक्षा, महिलाओं के स्वास्थ्य और चिकित्सा अधिकारों के लिए वे सतत संघर्षरत हैं। उनका दृढ़ विश्वास है कि शिक्षित और सशक्त नारी ही समृद्ध समाज की आधारशिला है।
सेवा और संवेदना की त्रिवेणी : कर्म ही पहचान
मंजू झा का सामाजिक जीवन सेवा और संवेदना का अद्भुत संगम है। असहाय, वंचित और पीड़ित लोगों के प्रति उनका हृदय सदैव करुणा से भरा रहता है। वे केवल समस्याओं को उठाने तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि उनके समाधान और निष्पादन तक सक्रिय रहती हैं। उनकी कार्यशैली में निस्वार्थ सेवा, त्वरित क्रियान्वयन और परिणामोन्मुख दृष्टि स्पष्ट दिखाई देती है।
भाषा और साहित्य की साधिका : मैथिली की मधुर प्रवाहिनी
मैथिली भाषा और साहित्य के संवर्द्धन में उनका योगदान अत्यंत उल्लेखनीय और प्रेरणास्पद है। वे केवल साहित्यिक गतिविधियों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अपने सशक्त विचारों, लेखन और प्रभावशाली वक्तव्यों के माध्यम से मैथिली को समकालीन विमर्श से जोड़ने का महत्त्वपूर्ण कार्य कर रही हैं। उनकी अभिव्यक्ति में ऐसी सहज मधुरता, गहनता और प्रवाह है, जो श्रोताओं और पाठकों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का अद्भुत सामर्थ्य रखती है। वे परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन स्थापित करते हुए मैथिली भाषा को नई पीढ़ी के लिए अधिक प्रासंगिक और जीवंत बना रही हैं।
ज्ञान के लोकतंत्रीकरण की एक महत्वपूर्ण पहल
मंजू झा ने अपनी शिक्षा प्रतिष्ठित पटना साइंस कॉलेज से प्राप्त कर अपने बौद्धिक व्यक्तित्व की सुदृढ़ नींव रखी। विधि के क्षेत्र में उनकी गहरी रुचि और सामाजिक प्रतिबद्धता ने उन्हें एक सक्षम अधिवक्ता के साथ-साथ संवेदनशील चिंतक के रूप में स्थापित किया। उन्होंने अनेक विधि संबंधी पुस्तकों का मैथिली में अनुवाद कर जटिल कानूनी विषयों को आमजन के लिए सरल और सुलभ बनाया। उनका यह प्रयास ज्ञान के लोकतंत्रीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है, जिससे मैथिली भाषी समाज में विधि-जागरूकता का प्रभावी विस्तार हुआ है।
कर्म, करुणा और संस्कृति की प्रेरक गाथा
संक्षेप में कहें तो मंजू झा एक ऐसा बहुआयामी व्यक्तित्व हैं, जिनमें ‘विधि का विवेक’, ‘सेवा की संवेदना’ और ‘संस्कृति का समर्पण’ एक साथ समाहित हैं। वे ‘कलम’ से कानून को सशक्त करती हैं, ‘हृदय’ से समाज को संवारती हैं और ‘संकल्प’ से संस्कृति की रक्षा करती हैं। आधुनिकता के इस युग में वे परंपरा और प्रगतिशीलता के संतुलन का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। उनका जीवन यह संदेश देता है कि यदि उद्देश्य व्यापक हो और संकल्प अटूट, तो एक व्यक्ति भी समाज में व्यापक परिवर्तन का सूत्रधार बन सकता है।
लेखिका सारिका झा एक समर्पित शिक्षिका होने के साथ-साथ भारत सरकार के कला एवं संस्कृति मंत्रालय में सीनियर रिसर्च फेलो के रूप में कार्यरत हैं।
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