सूखी तपती धरती को पानी से लबालब करने की जिद

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कुछ पाने की तड़प जब जिद बन जाती है तब कुछ भी असंभव नहीं रह जाता है। बुंदेलखंड के कुछ उत्साही किसानों ने भी कुछ ऐसा ही ठाना। सूखी और तपती धरती को पानी से लबालब करने का लक्ष्य मन में बनाया और बिना किसी आर्थिक और तकनीकी मदद के निकल पड़े तो फिर पीछे नहीं देखा। खेतों पर मेड़ बना दिए और मेड़ों पर पेड़ लगा दिए। जब बारिश का मौसम आया तो पानी खेतों में ही रुक गया। कुछ ही दिनों में जो पानी बेकार बहकर सूख जाता था, वह अब तालाब और छोटी नदी का रूप ले लिया।

यूपी के बांदा जनपद के जखनी गांव के लोगों ने जल संरक्षण की ऐसी तकनीकी विकसित की जो दुनिया के सामने नजीर बन गई। वे लोग वैज्ञानिक नहीं हैं, न ही किसी सरकार या संस्था से अनुदान लिए हैं और न ही जल संरक्षण के किसी विशेष शोध समूह (Research Team) का ही हिस्सा हैं, लेकिन खुद के प्रयासों से उन्होंने वीरों की धरती बुंदेलखंड के उस क्षेत्र को हरा-भरा बना दिया, जिसे सिर्फ सूखी, बंजर और पथरीली भूमि के लिए जाना जाता था। गांव के उमा शंकर पांडेय और उनकी प्रेरणा से गांव के अन्य लोग स्वयं फावड़ा उठाकर श्रमदान से मेड़बंदी कर बारिश के पानी को रोके। इस देसी तकनीकी ने ऐसा कमाल दिखाया कि सूखा पड़ा गांव जलदार गांव में बदल गया। खुद भारत सरकार के नीति आयोग ने इसको संज्ञान में लिया और वॉटर मैनेजमेंट इंडेक्स 2019 (Water Management Index 2019) में जखनी गांव को मॉडल गांव (Model village) के तौर पर पेश किया।

इस काम के प्रणेता उमा शंकर पांडेय बताते हैं कि सन 2005 में दिल्ली में जल और ग्राम विकास को लेकर एक कार्यशाला हुई थी। उसमें तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम भी मौजूद रहे। उन्होंने लोगों का आह्वान किया कि बिना धन और तकनीकी के खेतों में मेड़ बनाकर जल को रोकें। हालांकि ऐसा कोई कर नहीं रहा था। इस अपील पर उमा शंकर पांडेय ने स्वयं पहल की और अपने पांच एकड़ खेत की मेड़ बनाई और पानी को रोकना शुरू किया। उनकी प्रेरणा से गांव के पांच अन्य किसानों ने भी यही किया। फिर 20 किसान आगे बढ़े। देसी तकनीकी का असर दिखा। गांव के हर घर में प्रयोग किया गया और देखते ही देखते मेड़बंदी तकनीक से बचाए गए जल को पाइप लाइन और नालियों के जरिए छोटे-छोटे कुओं तक पहुंचा दिया गया।

भारत सरकार के नीति आयोग ने जलपुरुष उमा शंकर पांडेय के इस प्रयास को देखकर जखनी गांव को भारत का पहला ‘जल-ग्राम’ घोषित किया है। नीति आयोग के जल सलाहकार अविनाश मिश्र का मानना है कि वर्षा जल को भूमि के अंदर संरक्षण करने का जो तरीका जखनी गांव के किसानों नवजवानों ने अपनाया है, उस परंपरागत तरीके से ही भूजल का स्तर बढ़ाया जा सकता है। वे कहते हैं कि गांव के लोगों के सामूहिक प्रयास से ही वर्षा जल की कमी दूर होगी और जल संकट से निपटने का यही सामुदायिक सहभागिता एकमात्र रास्ता है।

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कार के जल शक्ति सचिव यूपी सिंह ने स्वयं जखनी जल ग्राम का भ्रमण किया था। उन्होंने जखनी गांव के सामुदायिक परंपरागत जल संरक्षण प्रयास को सबसे उचित और उपयुक्त तरीका माना था। उन्होंने मीडिया के सामने कहा भी था कि जल संरक्षण के लिए बगैर सरकारी मदद के समुदायिक प्रयास के जिस तरीके को जखनी गांव के किसानों-नवजवानों ने अपनाया है वही तरीका पूरे देश में अपनाया जाना चाहिए।

गांव की बदल गई तकदीर 
अपने अनोखे प्रयास से जखनी गांव को जलग्राम का दर्जा दिलाने वालों ने अपने सामने ही गांव की तकदीर बदलते देखी। करीब 17-18 साल पहले तक जो गांव अशिक्षित और बेरोजगारों के गांव के रूप में जाना जाता था, वहां अब प्राइमरी से लेकर इंटर कॉलेज तक के शिक्षा केंद्र चल रहे हैं। अफसर और जनप्रतिनिधि स्वयं गांव की फिजा का ताजा हालात जानने के लिए आने लगे हैं।

जो कमाने के लिए परदेश गए थे, वे गांव आ गए
जखनी को पानी से लबालब करने और सूखी धरती का गला तर करने में नायक बने जलग्राम समिति के संयोजक उमाशंकर पांडेय के मुताबिक दो दशक पहले यहां सिर्फ बेरोजगारी और अशिक्षा का माहौल था। आज आलम यह है कि जो लोग कमाने के लिए गांव छोड़कर गए थे, वे अब गांव लौटने लगे हैं। ऐसे युवा और नवजवान गांव में न केवल बेहतर माहौल में रोजगार कर रहे हैं, बल्कि अब पानी बचाने और उससे परंपरागत खेती-किसानी करके अच्छा जीवन जी रहे हैं।

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Sanjay Dubey is Graduated from the University of Allahabad and Post Graduated from SHUATS in Mass Communication. He has served long in Print as well as Digital Media. He is a Researcher, Academician, and very passionate about Content and Features Writing on National, International, and Social Issues. Currently, he is working as a Digital Journalist in Jansatta.com (The Indian Express Group) at Noida in India. Sanjay is the Director of the Center for Media Analysis and Research Group (CMARG) and also a Convenor for the Apni Lekhan Mandali.

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