Farm To Job: कभी ‘जी हुज़ूरी न करना’ था शान, आज उसको पाने का है अरमान

Farming, Job crisis

Photo-Credit: Ramkumar Radhakrishnan. (Wikimedia)

Decreasing Agriculture and Job Crisis: भारत में रोजगार को लेकर भारी विषमता की स्थिति शुरू से रही है। आजादी के पहले लोग खेती के काम में वंश दर वंश परंपरा के साथ लगे रहते थे। तब लोगों के पास खेती करने लायक जरूरत भर की या उससे भी अधिक जमीन होती भी थी और जिनके पास नहीं भी थी, वे खेतों में मजदूरी करके जीविका को आसानी से चलाने में सक्षम थे।

तब शिक्षित और अशिक्षित सभी तरह के लोग खेत में कुछ न कुछ मेहनत करने को खुशी-खुशी तैयार रहते थे। नौकरी बहुत जरूरी नहीं समझा जाता था। बल्कि होता यह था कि परिवार में अगर पांच पुरुष हैं तो नौकरी में कोई एक या अधिक से अधिक दो ही जाते थे। दरअसल नौकरी करने को किसी का नौकर होने जैसा माना जाता था। आन-बान-शान के जमाने में यह भी किसी को गवारा नहीं था कि वह या उसके परिवार का कोई सदस्य जाकर अफसरों की जी-हुज़ूरी करे।

हालांकि सेना में जाकर नौकरी करना तब भी स्वीकार्य था, वह इस नाते कि सेना में जाकर राष्ट्र और समाज के लिए सेवा करने जैसी भावना अंग्रेजों के खिलाफत में चल रहे आंदोलन से प्रेरित था। कुछ अन्य लोग भी समाज सेवा भावना से नौकरी करने को उत्सुक रहते थे।

: खास बातें :
नौकरी करने को किसी का नौकर होने जैसा माना जाता था। आन-बान-शान के जमाने में यह भी किसी को गवारा नहीं था कि वह या उसके परिवार का कोई सदस्य जाकर अफसरों की जी-हुजूरी करे

आज स्थिति यह है कि खेती घाटे का व्यापार बन गया है और इसमें लागत भर की आमदनी भी नहीं हो पा रही है। इसकी वजह से बड़ी-बड़ी कंपनियां खेतों की जमीन खरीद कर उससे मुनाफा कमा रही है।

ऐसा इसलिए भी था कि अंग्रेजी शासन में कई लोग अंग्रेजों के उच्च अफसरों से अपनी निकटता पाने के लिए और उच्च ओहदे की आस में नौकरी करने को तैयार रहते थे। कुछ ऐसे लोग भी थे, जो कुलीन परिवार से थे और विलायत में जाकर या भारत के तत्कालीन प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों से उच्च शिक्षित थे, वे वकील, शिक्षक, कलेक्टर आदि बन जाया करते थे।

आजादी मिलने के बाद शुरुआती दौर में सत्ता की बागडोर देश के राजनेताओं के हाथ में आने के साथ ही उनके सामने व्यवस्था संचालन और राष्ट्र को एकजुट रखने की बड़ी चुनौती थी। सबसे बड़ी चुनौती थी देश के बंटवारे के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच अपना सब कुछ छोड़कर उधर से इधर आए लोगों को बसाने और उनकी जीविका का प्रबंध करने की।

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अंग्रेजों से मुक्ति की खुशी मिलने के साथ ही बंटवारे ने गहरी चोट भी पहुंचाई थी। इससे आजादी के संघर्ष में जुटे देशवासियों के सामने अचानक इतने बड़े देश को आगे ले जाने का बड़ा संकट भी सामने था। इसकी वजह से हमारे सत्ताधीशों ने लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के लिए बड़े-बड़े उद्योग धंधों को स्थापित करने का निर्णय लिया।

इससे देश में कई नए उद्योग शुरू हुए, सड़कों का जाल बिछना शुरू हुआ, स्कूल-कॉलेजों की स्थापना हुई। शहरों को रेलगाड़ियों से जोड़ने के लिए रेल लाइनों बिछाई जाने लगी। अब परिस्थितियां बदलीं और लोग नौकरी की ओर जाने के लिए आगे आने लगे। अब खेती में आकर्षण खत्म होने और शहरों में जाकर नौकरी करने का दौर शुरू हुआ। इससे धीरे-धीरे खेती कम होने लगी और रोजगार के नए साधन विकसित होने लगे।

आज स्थिति यह है कि खेती घाटे का व्यापार बन गया है और इसमें लागत भर की आमदनी भी नहीं हो पा रही है। इसकी वजह से बड़ी-बड़ी कंपनियां खेतों की जमीन खरीद कर उससे मुनाफा कमा रही है। खेती भी अब उद्योगपतियों का व्यापार बन गया है। वे कई सौ एकड़ खेतिहर भूमि को किसानों और कास्तकारों से लेकर उसमें मशीनों का प्रयोग कर खुद खेती करवा रहे हैं। उनकी खेती में जैविक खादों का प्रयोग बंद कर पेस्टीसाइट्स और यूरिया के माध्यम से ज्यादा पैदावार और कम पोषक वाले अनाजों उत्पादित किए जा रहे हैं।

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