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Tuberculosis in India: खामोश बीमारी का सच, शरीर ही नहीं, समाज को भी तोड़ रही टीबी

टीबी के विरुद्ध लड़ाई में वैज्ञानिक शोध निरंतर नई आशाएं जगा रहा है। (Image Source: GeminiAI)

Tuberculosis in India: मानव सभ्यता के इतिहास में कुछ रोग ऐसे रहे हैं, जिन्होंने केवल शरीर को ही नहीं, बल्कि समाज, अर्थव्यवस्था और संस्कृति की दिशा को भी गहराई से प्रभावित किया है। क्षय रोग,जिसे आज हम ट्यूबरक्लोसिस (TB) के नाम से जानते हैं। ऐसा ही एक मूक, किंतु विनाशकारी शत्रु रहा है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों में इसे ‘राजयक्ष्मा’ कहा गया, जबकि यूरोप में यह ‘White Plague’ के नाम से कुख्यात हुआ।

साहित्य और कला भी इससे अछूते नहीं रहे। महान रचनाकार जैसे John Keats, Anton Chekhov और Franz Kafka इस रोग के शिकार बने। 24 मार्च 1882 को Robert Koch ने Mycobacterium tuberculosis की खोज की घोषणा की। यह चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में एक क्रांतिकारी क्षण था। आज यही तिथि विश्व क्षय रोग दिवस के रूप में मनाई जाती है, जो हमें यह स्मरण कराती है कि यह संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है।

Tuberculosis in India: टीबी कैसे फैलती है और क्यों है खतरनाक

क्षय रोग एक जीवाणुजनित संक्रामक रोग है, जिसका कारक Mycobacterium tuberculosis है एक अत्यंत धैर्यवान और अनुकूलनशील सूक्ष्मजीव। यह रोग मुख्यतः ड्रॉपलेट संक्रमण के माध्यम से फैलता है। संक्रमित व्यक्ति के खांसने, छींकने या बोलने पर हवा में फैलने वाले सूक्ष्म कण स्वस्थ व्यक्ति के फेफड़ों में प्रवेश कर जाते हैं। यद्यपि टीबी मुख्यतः फेफड़ों (Pulmonary TB) को प्रभावित करता है, लेकिन यह रक्त के माध्यम से शरीर के अन्य अंगों जैसे मस्तिष्क, हड्डियों, गुर्दों और लसीका ग्रंथियों तक फैल सकता है। इस स्थिति को Extra-pulmonary TB कहा जाता है।

टीबी की सबसे जटिल विशेषताओं में से एक है इसकी सुप्त अवस्था (Latent TB)। इस अवस्था में बैक्टीरिया शरीर में निष्क्रिय रहता है और कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। किंतु जैसे ही प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर होती है कुपोषण, मधुमेह या अन्य रोगों के कारण यह सक्रिय होकर बीमारी का रूप ले लेता है। यही कारण है कि टीबी केवल संक्रमण नहीं, बल्कि “समय की प्रतीक्षा करता हुआ खतरा” भी है।

टीबी केवल एक स्वास्थ्य समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक असमानता का सजीव प्रतिबिंब है। अमेरिका, जापान और पश्चिमी यूरोप जैसे विकसित देशों में मजबूत स्वास्थ्य प्रणाली, समय पर जांच और बेहतर जीवन स्तर के कारण टीबी पर काफी हद तक नियंत्रण पा लिया गया है। इसके विपरीत, दक्षिण-पूर्व एशिया और अफ्रीका के कई देशों में यह अब भी महामारी का रूप लिए हुए है। भीड़भाड़, गरीबी, कुपोषण और अपर्याप्त स्वास्थ्य सेवाएं इसके प्रसार को बढ़ावा देती हैं। वैश्विक स्तर पर लगभग 60% टीबी मामलों का भार भारत, चीन, इंडोनेशिया, नाइजीरिया, पाकिस्तान और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों पर केंद्रित है, जो इस असंतुलन को स्पष्ट करता है।

भारत इस वैश्विक युद्ध का सबसे महत्वपूर्ण मोर्चा है। विश्व के कुल टीबी मामलों का लगभग 27% हिस्सा अकेले भारत में पाया जाता है। भारत सरकार टीबी (क्षय रोग) के उन्मूलन के लिए व्यापक और बहु-आयामी कार्यक्रम चला रही है, जिसका मुख्य आधार राष्ट्रीय क्षय उन्मूलन कार्यक्रम (National TB Elimination Programme – NTEP) है। सरकार ने टीबी की शीघ्र और सटीक पहचान के लिए Truenat और CB-NAAT जैसी आधुनिक जांच तकनीकों को देशभर में विस्तारित किया है। उपचार के दौरान मरीजों को निक्षय पोषण योजना के तहत प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है, ताकि कुपोषण से लड़ते हुए उनका स्वास्थ्य तेजी से सुधर सके।

‘निक्षय पोर्टल’ के माध्यम से मरीजों की निगरानी और उपचार की ट्रैकिंग की जाती है, जिससे दवा का नियमित सेवन सुनिश्चित होता है। इसके साथ ही ‘निक्षय मित्र’ पहल के तहत समाज, संस्थाएं और कॉर्पोरेट क्षेत्र मरीजों को गोद लेकर उनके पोषण और देखभाल में सहयोग करते हैं। दवा-प्रतिरोधी टीबी (MDR/XDR-TB) के उपचार के लिए विशेष व्यवस्थाएं की गई हैं और नई दवाओं का उपयोग बढ़ाया जा रहा है। जागरूकता अभियान, मुफ्त जांच और उपचार, तथा निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ाकर सरकार इस दिशा में समग्र प्रयास कर रही है।

इन सभी पहलों के माध्यम से भारत टीबी उन्मूलन की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं के अंतर्गत टीबी रोगियों को उपचार के दौरान पोषण हेतु प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता दी जाती है। ‘Truenat’ और ‘CB-NAAT’ जैसी आधुनिक तकनीकों ने टीबी की पहचान को तेज और सटीक बना दिया है, जिससे समय पर उपचार संभव हो सका है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “टीबी मुक्त भारत”अभियान अपने लक्ष्‍य के अनुरूप चल रहा है। इसी के तहत 24 मार्च 2026 को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा स्थित गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय से “टीबी मुक्त भारत अभियान – 100 दिन अभियान” की शुरुआत की। साथ ही “टीबी मुक्त भारत ऐप” और “टीबी मुक्त अर्बन वार्ड पहल” का भी शुभारंभ किया।

Tuberculosis in India: इलाज, चुनौतियां और आगे की राह

टीबी के विरुद्ध इस संघर्ष को और जटिल बनाता है MDR-TB (Multi-Drug Resistant TB) और XDR-TB (Extensively Drug Resistant TB) का बढ़ता खतरा। जब रोगी दवाओं का पूरा कोर्स नहीं करता या अनियमितता बरतता है, तो बैक्टीरिया दवाओं के प्रति प्रतिरोधी बन जाता है। जहां सामान्य टीबी का उपचार लगभग 6 महीनों में संभव है, वहीं MDR-TB का इलाज 18–24 महीनों तक चलता है, जो अधिक महंगा, जटिल और शारीरिक रूप से कष्टदायक होता है। XDR-TB की स्थिति तो और भी गंभीर है, जहां उपचार के विकल्प सीमित हो जाते हैं।

टीबी का प्रभाव समाज के विभिन्न वर्गों पर अलग-अलग रूपों में दिखाई देता है। बच्चों में- पहचान कठिन, प्रभाव दीर्घकालिक। युवाओं में- आर्थिक उत्पादकता पर सीधा प्रभाव। बुजुर्गों में- कमजोर प्रतिरक्षा और सह-रोगों के कारण अधिक जोखिम। एचआईवी संक्रमित मरीजों में- टीबी मृत्यु का प्रमुख कारण बन जाती है। यह विविधता इस रोग को और अधिक जटिल बना देती है।

क्षय रोग केवल जैविक नहीं, बल्कि सामाजिक परिस्थितियों से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। कुपोषण शरीर को कमजोर कर टीबी के लिए उपजाऊ भूमि तैयार करता है। सामाजिक कलंक (Stigma) रोगियों को अपनी बीमारी छिपाने पर मजबूर करता है। भीड़भाड़ और अस्वच्छता संक्रमण को तेजी से फैलाते हैं। स्पष्ट है कि टीबी का उन्मूलन केवल दवाओं से नहीं, बल्कि जीवन स्तर में सुधार से संभव है।

सरकारी प्रयास तभी सफल होते हैं जब समाज उनका सक्रिय सहयोग करे। ‘निक्षय मित्र’ जैसी पहल इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिसमें नागरिक, संस्थाएं और कॉर्पोरेट क्षेत्र टीबी रोगियों को गोद लेकर उनके पोषण और देखभाल में सहयोग करते हैं। साथ ही, दो सप्ताह से अधिक खांसी को नजरअंदाज न करना यह एक छोटा कदम होते हुए भी संक्रमण रोकने की दिशा में बड़ी भूमिका निभा सकता है

टीबी के विरुद्ध लड़ाई में वैज्ञानिक शोध निरंतर नई आशाएं जगा रहा है। BCG वैक्सीन बच्चों में आंशिक सुरक्षा प्रदान करती है। mRNA आधारित वैक्सीन भविष्य की संभावनाओं को मजबूत कर रही हैं। डिजिटल टेक्नोलॉजी और मोबाइल ऐप्स के माध्यम से रोगियों की दवा लेने की निगरानी की जा रही है। यह तकनीकी समन्वय उपचार को अधिक प्रभावी और निरंतर बना रहा है।

क्षय रोग का उन्मूलन केवल चिकित्सा विज्ञान की उपलब्धियों से संभव नहीं है। इसके लिए एक व्यापक सामाजिक दृष्टिकोण आवश्यक है। जिसमें बेहतर जीवन स्तर, संतुलित पोषण, स्वच्छता और जागरूकता शामिल हों।“टीबी हारेगा, भारत जीतेगा” यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय दायित्व है। जब विज्ञान की शक्ति, सरकार की नीतियां और समाज की संवेदनशीलता एक साथ मिलती हैं, तभी ऐसी महामारियों का अंत संभव होता है। वह दिन दूर नहीं जब क्षय रोग इतिहास की एक त्रासदी बनकर रह जाएगा और मानवता एक स्वस्थ, सशक्त और उज्ज्वल भविष्य का स्वागत करेगी।