प्रशांत सिन्हा
Biodiversity Day: संयुक्त राष्ट्र की पहल पर हर वर्ष 22 मई को अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस मनाया जाता है। इसका उद्देश्य पृथ्वी पर मौजूद जीव-जंतुओं, वनस्पतियों और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाना है। यह दिवस हमें याद दिलाता है कि मनुष्य और प्रकृति का संबंध केवल उपयोग का नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व का है।
पृथ्वी पर जीवन की निरंतरता के लिए जैव विविधता का सुरक्षित रहना अत्यंत आवश्यक है। वर्ष 2026 के लिए इस दिवस का विषय “वैश्विक प्रभाव के लिए स्थानीय स्तर पर कार्य करना” रखा गया है। यह थीम इस बात पर बल देती है कि स्थानीय समुदायों, गांवों, शहरों और आम नागरिकों के छोटे-छोटे प्रयास भी वैश्विक स्तर पर बड़ा बदलाव ला सकते हैं।
‘जैव विविधता (Biodiversity Day)’ शब्द का प्रयोग पहली बार अमेरिकी जीव विज्ञानी एडवर्ड ओस्बोर्न विल्सन ने 1986 में ‘अमेरिकन फोरम ऑन बायोलॉजिकल डायवर्सिटी’ के दौरान किया था। इसका अर्थ पृथ्वी पर मौजूद जीवों, वनस्पतियों, सूक्ष्म जीवों और पारिस्थितिक तंत्रों की विविधता से है। जंगलों, नदियों, पर्वतों, समुद्रों और रेगिस्तानों से लेकर हमारे आसपास मौजूद छोटे जीव-जंतुओं तक, सभी जैव विविधता का हिस्सा हैं। यही विविधता पृथ्वी को जीवंत और संतुलित बनाए रखती है।
आज पूरी दुनिया जैव विविधता के गंभीर संकट का सामना कर रही है। संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता सम्मेलन (CBD) में प्रस्तुत भारत की छठी राष्ट्रीय रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया था कि देश में कई जीव प्रजातियां लगातार संकटग्रस्त होती जा रही हैं। अंतरराष्ट्रीय रेड लिस्ट में शामिल अनेक भारतीय प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी हैं। इनमें स्तनधारी, पक्षी, उभयचर और समुद्री जीवों की कई दुर्लभ प्रजातियां शामिल हैं।
Biodiversity Day: मौजूदा हालात पूरी दुनिया के लिए चेतावनी
World Wide Fund for Nature की ‘लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट 2022’ के अनुसार पिछले 50 वर्षों में दुनिया भर में वन्यजीवों की आबादी में औसतन 69 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। यह गिरावट केवल किसी एक देश या क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया में प्रकृति के बिगड़ते संतुलन की चेतावनी है। रिपोर्ट के अनुसार लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्रों में वन्यजीव आबादी में सबसे अधिक कमी दर्ज की गई, जबकि एशिया और अफ्रीका में भी स्थिति चिंताजनक (Wildlife Crisis) बनी हुई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि वनों की अंधाधुंध कटाई, अनियंत्रित शहरीकरण, औद्योगीकरण, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन ने इस संकट को और गंभीर बना दिया है। समुद्री पारितंत्र भी इससे अछूते नहीं हैं। अत्यधिक मछली पकड़ने और जल प्रदूषण के कारण समुद्री जीवों की संख्या तेजी से घट रही है। ताजे पानी में रहने वाली प्रजातियों की स्थिति तो और भी खराब है, जहां कई जीव तेजी से विलुप्ति की ओर बढ़ रहे हैं।
Biodiversity Day: भारत में भी संकट गंभीर
भारत भी इस संकट से अलग नहीं है। यहां अनेक वन्य जीव और वनस्पति प्रजातियां खतरे में हैं। कई दुर्लभ पक्षी, उभयचर और स्तनधारी जीव लगातार अपने प्राकृतिक आवास खो रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार पृथ्वी पर लाखों प्रजातियां मौजूद हैं, लेकिन उनमें से बड़ी संख्या अब तक वैज्ञानिक रूप से दर्ज भी नहीं हो पाई है। यही कारण है कि जैव विविधता का संरक्षण केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व का प्रश्न बन चुका है।
दरअसल, जैव विविधता केवल जंगलों और वन्यजीवों तक सीमित नहीं है। मनुष्य का भोजन, दवाइयां, वस्त्र, कृषि और उद्योग भी इसी पर निर्भर हैं। प्राकृतिक संसाधनों का संतुलन बिगड़ने का सीधा असर मानव जीवन पर पड़ता है। जलवायु परिवर्तन, बढ़ती गर्मी, असामान्य वर्षा, सूखा और बाढ़ जैसी आपदाएं इसी असंतुलन का परिणाम हैं। इसलिए जैव विविधता की रक्षा भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित जीवन सुनिश्चित करने की शर्त भी है।
मार्को लैम्बर्टिनी ने कहा था कि दुनिया इस समय जलवायु संकट और जैव विविधता के नुकसान की दोहरी आपात स्थिति का सामना कर रही है। यह चेतावनी केवल वैज्ञानिकों की चिंता नहीं, बल्कि पूरी मानव सभ्यता के लिए एक गंभीर संदेश है। यदि समय रहते प्रकृति संरक्षण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो इसके परिणाम आने वाले वर्षों में और भयावह हो सकते हैं।
इस चुनौती से निपटने के लिए सरकारों, वैज्ञानिक संस्थानों और समाज को मिलकर काम करना होगा। वनों के संरक्षण, जल स्रोतों की रक्षा, प्रदूषण पर नियंत्रण और टिकाऊ विकास की नीतियों को प्राथमिकता देनी होगी। साथ ही लोगों को भी अपने स्तर पर पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार व्यवहार अपनाना होगा। प्लास्टिक का कम उपयोग, जल और ऊर्जा की बचत, वृक्षारोपण और जैविक संसाधनों के संरक्षण जैसे छोटे कदम भी बड़ा परिवर्तन ला सकते हैं।
अंतरराष्ट्रीय जैव विविधता दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी का स्मरण है। पृथ्वी पर जीवन का संतुलन तभी सुरक्षित रह सकता है, जब विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कायम रखा जाए। जैव विविधता मानव सभ्यता की साझा विरासत है और इसकी रक्षा करना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।
लेखक वरिष्ठ पर्यावरणविद् एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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