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Chartered Aircraft Crashes: बारामती हादसे से खुली विमानन सुरक्षा की पोल

Chartered Aircraft Crashes: बारामती विमान हादसे के बाद एक बार फिर हवाई यात्रा की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। (Image Source: Meta AI)

Chartered Aircraft Crashes: भारत में चार्टर्ड और निजी विमानों के हादसे अब केवल तकनीकी खराबी या दुर्भाग्य की घटनाएं नहीं रह गई हैं। महाराष्ट्र के बारामती में 28 जनवरी 2026 को हुए लेयरजेट-45 विमान हादसे में अजित पवार सहित पांच लोगों की मौत ने यह साफ कर दिया है कि देश का विमानन सुरक्षा ढांचा गंभीर दबाव में है। यह दुर्घटना ऐसे समय हुई, जब अहमदाबाद के बड़े विमान हादसे को लेकर देश अभी उबर भी नहीं पाया था।

चार्टर्ड और निजी विमान अनिर्धारित समय-सारिणी यानी नॉन शेड्यूल्ड ऑपरेशंस (NSOP) के तहत संचालित होते हैं। इन उड़ानों की सबसे बड़ी विशेषता लचीलापन है, लेकिन यही लचीलापन सुरक्षा के लिहाज से सबसे बड़ा खतरा भी बनता जा रहा है। व्यावसायिक एअरलाइंस की तुलना में इन उड़ानों पर निगरानी कम, नियम अपेक्षाकृत ढीले और निरीक्षण सीमित होता है।

Chartered Aircraft Crashes: छोटे विमानों की सुरक्षा में लापरवाही

नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) और विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो (AAIB) की रिपोर्टें लगातार यह संकेत देती रही हैं कि छोटे विमानों की सुरक्षा को उतनी प्राथमिकता नहीं दी गई, जितनी बड़े व्यावसायिक विमानों को। पिछले पांच वर्षों में भारत में चार्टर्ड विमानों और हेलिकॉप्टरों के 15 से अधिक गंभीर हादसे दर्ज किए गए हैं। बीते दो दशकों में देश में कुल लगभग 95 विमान दुर्घटनाएं हो चुकी हैं।

Chartered Aircraft Crashes: विमान कम, लेकिन दुर्घटना दर अधिक

एशियाई देशों में भारत विमान दुर्घटनाओं के मामले में इंडोनेशिया के बाद दूसरे स्थान पर आता है। यह स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है, जब यह देखा जाए कि भारत में निजी और चार्टर्ड विमानों की संख्या अमेरिका और यूरोप की तुलना में बहुत कम है, फिर भी प्रति दुर्घटना मृत्यु दर अधिक है।

अमेरिका में हर साल 1,200 से 1,500 छोटे विमान हादसे होते हैं, जबकि यूरोप में औसतन 150 से 200 लोगों की जान जाती है। लेकिन वहां निजी विमानन का दायरा भारत से सैकड़ों गुना बड़ा है। अंतर यह है कि विकसित देशों में हादसों के बाद त्वरित जांच, स्पष्ट जवाबदेही और सुधारात्मक कदम उठाए जाते हैं, जबकि भारत में सुधार अक्सर कागजों तक सीमित रह जाते हैं।

Chartered Aircraft Crashes: कम प्रशिक्षण पर भी निजी पायलट लाइसेंस

चार्टर्ड विमान हादसों के पीछे सबसे बड़ा कारण पायलट प्रशिक्षण और अनुभव में भारी अंतर है। व्यावसायिक एअरलाइंस के पायलटों के लिए 1,500 उड़ान घंटों का अनुभव अनिवार्य है, जबकि निजी पायलट लाइसेंस केवल 40 घंटों में मिल सकता है। कई चार्टर्ड पायलट कठिन मौसम, पहाड़ी क्षेत्रों और रात में उड़ान भरने के लिए पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित नहीं होते।

बुनियादी ढांचे की कमी भी गंभीर समस्या है। बारामती, केदारनाथ और अन्य छोटे हवाई अड्डों पर आधुनिक लैंडिंग सिस्टम, पूर्णकालिक एयर ट्रैफिक कंट्रोल और उन्नत मौसम निगरानी सुविधाओं का अभाव है। हल्के विमान तेज हवाओं, कोहरे और अचानक बारिश के प्रति बेहद संवेदनशील होते हैं, जिससे जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।

Chartered Aircraft Crashes: रखरखाव और तकनीकी निरीक्षण भी कमजोर

रखरखाव और तकनीकी निरीक्षण भी कमजोर कड़ी साबित हो रहे हैं। जहां व्यावसायिक एअरलाइंस पर डीजीसीए की कड़ी निगरानी रहती है, वहीं चार्टर्ड संचालकों में संसाधनों की कमी और लागत घटाने की प्रवृत्ति देखी जाती है। कई बार पुर्जों के रखरखाव और प्री-फ्लाइट जांच में लापरवाही बरती जाती है।

इसके अलावा वीआईपी यात्रियों को समय पर पहुंचाने का दबाव पायलटों को जोखिम भरे फैसले लेने पर मजबूर करता है। एएआईबी की कई जांच रिपोर्टों में यह सामने आया है कि पायलट की थकान और दबाव में लिए गए निर्णय हादसों का बड़ा कारण रहे हैं।

यदि भारत को भविष्य में बारामती या केदारनाथ जैसी त्रासदियों से बचना है, तो विमानन सुरक्षा को खर्च नहीं बल्कि अनिवार्यता मानना होगा। डीजीसीए को कागजी अनुपालन से बाहर निकलकर जमीनी स्तर पर निरीक्षण, प्रशिक्षण और निगरानी को मजबूत करना ही होगा।

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