करोड़ों रुपए बचे, पूर्वजों की मुफ्त विधि ने किया कमाल

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पानी जीवन की मूलभत आवश्यकता है। यह बात सबको पता है, लेकिन पानी की खपत की तुलना में पानी की उपलब्धता कितनी है, यह सबको नहीं पता है। यही वजह है कि पानी का उपयोग से ज्यादा पानी को बर्बाद किया जा रहा है। दुनिया को छोड़ दें, केवल अपने देश की बात करें तो कई राज्य ऐसे हैं, जहां पीने योग्य पानी की उपलब्धता बहुत कम रह गई है। दिल्ली, नोएडा, मुंबई, चेन्नई, बंगलूरू और हैदराबाद समेत सैकड़ों शहरों के लाखों परिवार पीने के लिए प्रतिदिन कैन वाला पानी खरीदते हैं। शहरी निगमों के पास पीने योग्य पानी को सीधे घरों तक आपूर्ति करने की क्षमता तो कई वर्ष पहले ही खत्म हो गई है।

यह भयावह स्थिति तब है जब भारत सरकार खरबों रुपए गंगा-यमुना समेत कई नदियों को प्रदूषण मुक्त करने में खर्च कर रही है। शहरों के हालात तो बदतर हैं ही, गांवों में भी स्थितियां बहुत अच्छी नहीं हैं। कुएं, तालाब और बाउली सूख गए हैं। कई गांवों में कुएं अब सिर्फ शादी-विवाह में घाट-बाट पूजन के लिए ही रह गए हैं, हालांकि उसमें पानी नहीं रहता है। पानी के न रहने से खेती भी खराब हो रही है। निबंध लिखते समय हम बड़े उत्साह के साथ लिखते हैं कि भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहां पर 70 फीसदी आबादी कृषि पर निर्भर है, लेकिन सच्चाई अब यह नहीं रह गई है। भारत में खेती अब महंगा सौदा है और इस पर निर्भरता अब कम होती जा रही है। खेती के लिए सबसे जरूरी पानी अब गांवों में भी उपलब्ध नहीं है। इससे खेती में पैसा और श्रम लगाने से कोई लाभ नहीं मिल रहा है। मजबूरन लोग खेती करने के बजाए मजदूरी करने को ज्यादा पसंद कर रहे हैं।

हालात सब जगह इतना खराब हो ऐसा नहीं है। यूपी के बुंदेलखंड क्षेत्र के बांदा जनपद के जखनी गांव में पानी बचाने के लिए स्थानीय लोगों ने ऐसा उपक्रम किया कि सूखे के लिए देशभर में विख्यात बांदा जनपद अब पानी से आबाद जनपद बन गया है। जखनी गांव के जलदूत, सर्वोदय कार्यकर्ता और जलग्राम स्वराज अभियान समिति के अध्यक्ष तथा ‘खेत में मेड़, मेड़ पर पेड़’ तकनीकी के प्रणेता उमाशंकर पांडेय के नेतृत्व में स्थानीय लोगों ने पूर्वजों की बताई तकनीकी का इस्तेमाल कर न केवल पानी बचायाृ, बल्कि जनपद को भी समृद्ध करने में भारी मदद की। उमाशंकर पांडेय ने खेत पर मेड़, मेड़ पर पेड़ की विधि अपनाकर अपने खेतों को उपजाऊ तो बनाया ही, खेतों को पर्याप्त पानी उपलब्ध कराकर फसलों की नई खेप निकलने में भी मदद की।

खेत पर मेड़, मेड़ पर पेड़ विधि शुरू करने वाले उमाशंकर पांडेय के मुताबिक इस विधि से वर्षा जल को खेत में ही रोककर उसका भरपूर इस्तेमाल कर लाभ उठाया जा सकता है। बारिश के दोरान पानी को खेतों में ही संरक्षित करने की इस तकनीकी का गहरा असर देखने को मिला। इससे जखनी गांव तो आबाद हुआ ही, पूरे जनपद को इससे फायदा मिला। आज वहां हालत यह है कि पर्याप्त पानी संरक्षण से अच्छी खेती हो रही है। पशुओं को भरपूर पानी मिलने से गाय-भैंस के दूध की मात्रा भी बढ़ गई है। गांव में समृद्धि आई तो बाहर कमाई करने गए लोग भी अब अपने घरों की ओर लौटना शुरू हो गए हैं।

पानी बचाने के इस जखनी मॉडल का असर यह पड़ा कि खुद भारत सरकार के नीति आयोग ने इस गांव को देश का जल गांव घोषित कर दिया। शासन के उच्च अधिकारी यहां पहुंचने लगे। नीति आयोग ने पानी बचाने के जखनी मॉडल की सराहना करते हुए, इसे पूरे देश में लागू करने की अपील की है। जखनी एक अंजान और गुमनाम गांव था। अब जखनी की पहचान समृद्ध, संपन्न और जलग्राम की हो गई है। स्थानीय अफसरों ने भी जखनी के बारे में ऐसे ही राय दी है।

cmarg author

Sanjay Dubey is Graduated from the University of Allahabad and Post Graduated from SHUATS in Mass Communication. He has served long in Print as well as Digital Media. He is a Researcher, Academician, and very passionate about Content and Features Writing on National, International, and Social Issues. Currently, he is working as a Digital Journalist in Jansatta.com (The Indian Express Group) at Noida in India. Sanjay is the Director of the Center for Media Analysis and Research Group (CMARG) and also a Convenor for the Apni Lekhan Mandali.

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