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International Mother Language Day 2026: पहचान, अवसर और एकता की कुंजी है भाषा

International Mother Language Day 2026: ब्रिटिश लिंग्वा पटना में आयोजित कार्यक्रम में बोलते हुए प्रख्यात शिक्षाविद् एवं सामाजिक चिंतक डॉ. बीरबल झा।

International Mother Language Day 2026: अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के अवसर पर British Lingua के सभागार में “भाषा, पहचान और अवसर” विषय पर एक प्रेरक और विचारोत्तेजक संगोष्ठी आयोजित की गई। कार्यक्रम में शिक्षकों, विद्यार्थियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों की उल्लेखनीय उपस्थिति रही। पूरा सभागार इस बात का साक्षी बना कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि समाज, अवसर और भविष्य निर्माण की केंद्रीय शक्ति है।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता प्रख्यात शिक्षाविद् एवं सामाजिक चिंतक Dr. Birbal Jha थे। अपने संबोधन की शुरुआत उन्होंने एक गहरे और सारगर्भित कथन से की: “भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं है; यह पहचान की आधारशिला, अवसरों का सेतु और मानवीय संबंधों की धड़कन है।” उनके इस कथन ने पूरे कार्यक्रम की दिशा तय कर दी।

उन्होंने स्पष्ट किया कि भाषा व्यक्ति की सोच, आत्मविश्वास और सामाजिक स्थिति को प्रभावित करती है। जिस समाज की भाषा सशक्त होती है, उसकी बौद्धिक और सांस्कृतिक पहचान भी मजबूत होती है।

International Mother Language Day 2026: जीवन का पहला संगीत मातृभाषा

डॉ. बीरबल झा ने मातृभाषा को “जीवन का पहला संगीत” बताया। उन्होंने कहा कि इंसान सबसे पहले अपनी मातृभाषा में ही प्रेम, स्नेह, संस्कार और सपनों को समझता है। यही भाषा उसकी पहचान और आत्मविश्वास की नींव रखती है। उन्होंने कहा, “आधुनिकता हमारे क्षितिज का विस्तार करे, हमारी जड़ों को न मिटाए।” उनका मानना था कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा के इस दौर में भी हमें अपनी मातृभाषा से जुड़ाव बनाए रखना चाहिए, क्योंकि यही हमारी सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करती है।

उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि जब शिक्षा की शुरुआती अवस्था मातृभाषा में होती है, तो बच्चे की समझ और रचनात्मकता अधिक विकसित होती है। मातृभाषा केवल विचार व्यक्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और आत्मविश्वास का आधार है।

British Lingua Patna: विविधता में एकता का सूत्र हिंदी

भारत जैसे बहुभाषी देश में हिंदी की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए डॉ. झा ने कहा कि हिंदी सामाजिक समन्वय का महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने कहा, “भाषा विविधता और एकता के बीच सेतु है।” उनके अनुसार हिंदी सार्वजनिक जीवन, प्रशासन, बाजार और सांस्कृतिक मंचों पर अलग-अलग भाषाई पृष्ठभूमि वाले लोगों को जोड़ने का काम करती है। हिंदी संवाद को सरल बनाती है और सामाजिक दूरी को कम करती है।

उन्होंने यह भी कहा कि किसी भाषा को थोपना समाधान नहीं है, बल्कि समावेशी दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है। जब संवाद सम्मान के साथ होता है, तब पूर्वाग्रह कम होते हैं और सहयोग की भावना मजबूत होती है।

Hindi and English education: वैश्विक अवसरों का द्वार अंग्रेज़ी

अंग्रेज़ी की भूमिका पर बोलते हुए डॉ. बीरबल झा ने संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने स्पष्ट कहा,
“अंग्रेज़ी आपकी पहचान निर्धारित नहीं करती; यह आपके अवसरों को विस्तृत करती है।”

उन्होंने अंग्रेज़ी को श्रेष्ठता का प्रतीक नहीं, बल्कि व्यावहारिक सशक्तिकरण का साधन बताया। आज के वैश्विक युग में अंग्रेज़ी दक्षता रोजगार, उच्च शिक्षा और अंतरराष्ट्रीय संवाद के अवसर खोलती है।

उन्होंने कहा कि British Lingua में अंग्रेज़ी शिक्षा का उद्देश्य उच्चारण की नकल करना नहीं, बल्कि स्पष्ट अभिव्यक्ति, आत्मविश्वास और रोजगार-क्षमता का विकास करना है। उनके अनुसार प्रभावी अंग्रेज़ी दक्षता युवाओं को वैश्विक मंच पर प्रतिस्पर्धी बनाती है।

Dr Birbal Jha speech: भाषा और सामाजिक न्याय

अपने संबोधन में डॉ. झा ने भाषा शिक्षा को सामाजिक न्याय का महत्वपूर्ण उपकरण बताया। उन्होंने कहा,“भाषा शिक्षा सामाजिक न्याय की क्रियाशील अभिव्यक्ति है।”

उन्होंने समझाया कि जब कोई व्यक्ति स्वयं को प्रभावी ढंग से व्यक्त नहीं कर पाता, तो उसकी प्रतिभा और क्षमता दब जाती है। संवाद की कमी अवसरों को सीमित कर देती है। वहीं, भाषा कौशल आत्मविश्वास बढ़ाता है और आत्मविश्वास अवसरों के द्वार खोलता है। उनका मानना था कि भाषा के माध्यम से ही समाज में समान अवसर सुनिश्चित किए जा सकते हैं।

Language Empowerment India: भ्रम नहीं, दक्षता है बहुभाषिकता

समापन में डॉ. बीरबल झा ने बहुभाषिकता को भारत की शक्ति बताया। उन्होंने कहा, “बहुभाषिकता भ्रम नहीं; दक्षता है।” उन्होंने आह्वान किया कि हम अपनी मातृभाषाओं का संरक्षण करें, राष्ट्रीय एकता के लिए हिंदी को सुदृढ़ करें और वैश्विक उत्कृष्टता के लिए अंग्रेज़ी में प्रवीणता प्राप्त करें। उनके अनुसार एक ऐसा राष्ट्र जो अपनी भाषाओं का सम्मान करता है, वह बौद्धिक रूप से समृद्ध और सामाजिक रूप से एकजुट रहता है।

कार्यक्रम के अंत में गूंजती तालियां इस बात का प्रमाण थीं कि भाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि पहचान, गरिमा, अवसर और भविष्य की दिशा है। भाषा दिलों को जोड़ती है, समाज का निर्माण करती है और करियर को आकार देती है—और इसी के साथ एक सशक्त राष्ट्र की नींव भी तैयार करती है।

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