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Kala Nidhi Division IGNCA: 37 साल, भारतीय ज्ञान परंपरा की जीवित विरासत

Kala Nidhi Division IGNCA: कार्यक्रम के दौरान सांस्कृतिक प्रस्तुति देते कलाकार।

Kala Nidhi Division IGNCA: संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन स्वायत्त संस्था इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए) के कलानिधि प्रभाग ने सोमवार को अपना 37वां स्थापना दिवस औपचारिक शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम के साथ मनाया। यह आयोजन नई दिल्ली स्थित जनपथ भवन के सम्वेत सभागार में संपन्न हुआ।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय संगठन सचिव श्री जे. नंदकुमार थे। विशेष अतिथि के रूप में दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी (डीटीयू) के कुलपति प्रो. प्रतीक शर्मा और विशिष्ट अतिथि के रूप में आयुष मंत्रालय, भारत सरकार के सचिव वैद्य राजेश कोटेचा उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता आईजीएनसीए ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री रामबहादुर राय ने की।

आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने उद्घाटन संबोधन दिया, जबकि कलानिधि प्रभाग के निदेशक एवं प्रमुख तथा आईजीएनसीए के डीन प्रो. (डॉ.) रमेश सी. गौर ने स्वागत भाषण प्रस्तुत किया। इस अवसर पर जेएनयू की एसोसिएट प्रोफेसर और एंथ्रोपोस फाउंडेशन की चेयरपर्सन डॉ. सुनीता रेड्डी भी मौजूद रहीं।

Kala Nidhi Division IGNCA: कई महत्वपूर्ण प्रकाशनों का लोकार्पण हुआ

स्थापना दिवस समारोह के अंतर्गत आईजीएनसीए द्वारा कई महत्वपूर्ण प्रकाशनों का लोकार्पण किया गया। इनमें ग्रीन विज़डम: मणिपुर, रूट्स ऑफ़ विज़डम: सिक्किम और व्हिस्पर्स ऑफ़ द फॉरेस्ट: अरुणाचल प्रदेश शामिल हैं, जिनके लेखक डॉ. सुनीता रेड्डी, प्रो. (डॉ.) रमेश सी. गौर एवं अन्य विद्वान हैं। इसके साथ ही डिजिटाइज़्ड मैन्युस्क्रिप्ट्स का इलस्ट्रेटेड कैटलॉग (खंड 8 से 13, भाग 1–12), जिसे प्रो. (डॉ.) रमेश सी. गौर एवं उनकी टीम ने संपादित किया है, तथा कलाकल्प : आईजीएनसीए जर्नल (वसंत पंचमी अंक 2026) का भी विमोचन किया गया।

Kala Nidhi Division IGNCA: Indian Knowledge
Kala Nidhi Division IGNCA: कार्यक्रम में पुस्तकों का लोकार्पण करते अतिथिगण।

कार्यक्रम में “क्राउनिंग ज्वेल्स: द इलस्ट्रेटेड रेयर बुक्स” शीर्षक से एक प्रदर्शनी का उद्घाटन हुआ और अंत में वसंत उत्सव पर आधारित सांस्कृतिक प्रस्तुति दी गई, जिसने आईजीएनसीए के जीवंत परंपरा और शोध के समन्वित दृष्टिकोण को रेखांकित किया।

Kala Nidhi Division IGNCA: देश के विद्वानों और साधकों के लिए एक संवाद मंच

मुख्य अतिथि श्री जे. नंदकुमार ने आईजीएनसीए, विशेषकर कलानिधि प्रभाग (Kala Nidhi Division IGNCA) को स्थापना दिवस की बधाई देते हुए कहा कि यह प्रभाग लंबे समय से आईजीएनसीए का बौद्धिक स्तंभ रहा है। यह न केवल भारत की सभ्यतागत ज्ञान परंपरा का संरक्षण, व्याख्या और प्रचार करता है, बल्कि शोधकर्ताओं, चिंतकों और साधकों के लिए एक जीवंत विद्वत पारिस्थितिकी तंत्र भी विकसित करता है। उन्होंने कहा कि आईजीएनसीए देश के विद्वानों और साधकों के लिए एक संवाद मंच की तरह कार्य करता है।

Kala Nidhi Division IGNCA: भारत की बौद्धिक चेतना को नई दिशा देने की पहल

श्री नंदकुमार ने यह भी कहा कि केंद्र का कार्य भारत-केंद्रित राष्ट्रीय शिक्षा नीति की भावना के अनुरूप है और भारत की बौद्धिक चेतना का झुकाव, जो ऐतिहासिक रूप से पश्चिम की ओर रहा है, उसे फिर से भारत की ओर मोड़ने की आवश्यकता है। उन्होंने असम, मेघालय और नागालैंड की वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित पारंपरिक औषधीय परंपराओं सहित पांडुलिपियों, सांस्कृतिक विरासत और मौखिक परंपराओं के संरक्षण की सराहना की। उत्तर-पूर्व की पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों पर प्रकाशित तीन नवीन ग्रंथों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि समुदाय के प्रति सम्मान के साथ ज्ञान का दस्तावेजीकरण ही आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित कर सकता है।

श्री रामबहादुर राय ने कहा कि कलानिधि प्रभाग का स्थापना दिवस ऐसे समय में शुरू हुआ था, जब सरस्वती पूजा का व्यापक प्रचलन नहीं था। उन्होंने कहा कि भक्ति, ज्ञान और कर्म का समन्वय ही समाज को दिशा देता है। दूरदराज़ क्षेत्रों में कार्यरत पारंपरिक वैद्य और आदिवासी साधक ज्ञान की अमूल्य धरोहर को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे लोगों को संरक्षण, मान्यता और वैज्ञानिक ढांचे की आवश्यकता है, ताकि उनका ज्ञान शोध के लिए उपलब्ध हो सके। उन्होंने भाषाओं में नए शब्दों और अभिव्यक्तियों के सृजन पर भी जोर दिया और देवी सरस्वती से ज्ञान की रक्षा एवं नए विचारों के सृजन की प्रेरणा की कामना की।

वैद्य राजेश कोटेचा ने कहा कि लंबे समय तक किसी क्षेत्र में कार्य करने के बाद हम अक्सर चीज़ों को आदतन दृष्टि से देखने लगते हैं, जिससे वैकल्पिक दृष्टिकोण छूट जाते हैं। उन्होंने औपनिवेशिक सोच से बाहर निकलकर भारतीय ज्ञान परंपराओं की गहराई को समझने पर बल दिया। संस्कृत अध्ययन का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि एक ही ज्ञान स्रोत से अनेक दृष्टियां प्राप्त हो सकती हैं, यदि उसे समग्र रूप से देखा जाए। उन्होंने भारत की जीवंत ज्ञान परंपराओं के संरक्षण और व्याख्या के महत्व को दोहराया।

प्रो. प्रतीक शर्मा ने कहा कि भारतीय समाज में परंपरागत रूप से ज्ञान को खंडों में बांट दिया गया, जिससे गुरु-शिष्य परंपरा की समग्र शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक शिक्षा से दूरी बन गई। स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण मिशन ने इस आत्मगौरव को पुनः जागृत किया। उन्होंने कहा कि जहां पश्चिमी ज्ञान बाह्य जगत पर प्रयोग करता है, वहीं भारतीय ज्ञान अंतःअनुभूति पर आधारित है। कला, संगीत, नृत्य, वास्तुकला और अनुष्ठानों का मौखिक संहिताकरण हुआ, पर सीमित दस्तावेजीकरण के कारण कुछ ज्ञान लुप्त भी हुआ। इस संदर्भ में कलानिधि प्रभाग की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, जो तकनीक के माध्यम से इन जटिल प्रणालियों को सुलभ बना रहा है। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति में ज्ञान के डी-कम्पार्टमेंटलाइजेशन पर भी प्रकाश डाला।

डॉ. सुनीता रेड्डी ने कहा कि असंहिताबद्ध पारंपरिक वैद्यों पर लिखित सामग्री अत्यंत सीमित है और उनका ज्ञान मुख्यतः मौखिक परंपरा में संरक्षित है। ऐसे जीवंत ज्ञान तंत्रों के दस्तावेजीकरण के लिए गुणात्मक और अनुभवजन्य शोध आवश्यक है। उन्होंने पंचायत स्तर पर ‘नॉलेज हट्स’ स्थापित करने और आयुष ढांचे के अंतर्गत गांव-स्तरीय नीतियों के माध्यम से पारंपरिक ज्ञान को स्थानीय शासन से जोड़ने की आवश्यकता बताई।

डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने बताया कि कलानिधि प्रभाग का स्थापना दिवस (Kala Nidhi Division IGNCA) सामान्यतः वसंत पंचमी को मनाया जाता है, लेकिन इस वर्ष गणतंत्र दिवस की रिहर्सल के कारण इसे 23 जनवरी को आयोजित किया गया। उन्होंने कलानिधि प्रभाग को आईजीएनसीए का हृदय बताते हुए कहा कि यह देश में संभवतः अद्वितीय पुस्तक प्रकाशन और परिचर्चा की परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। उन्होंने यूनेस्को की मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड योजना के तहत 2025 में श्रीमद्भगवद्गीता और नाट्यशास्त्र को मिली मान्यता का भी उल्लेख किया।

प्रो. (डॉ.) रमेश सी. गौर ने कहा कि कलानिधि प्रभाग आईजीएनसीए की पहली इकाई थी, जिसे केवल पुस्तकालय नहीं बल्कि भारत की सांस्कृतिक विरासत को विश्व स्तर पर प्रस्तुत करने वाले संसाधन केंद्र के रूप में विकसित किया गया। पांडुलिपियों के संरक्षण, डिजिटलीकरण और सूचीकरण की पहल यहीं से शुरू हुई, जो आगे चलकर राष्ट्रीय पांडुलिपि मिशन और अब ‘ज्ञानभारतं’ के रूप में विस्तारित हुई।

इस मिशन के तहत अब तक 2 लाख 92 हजार पांडुलिपियों का वर्णनात्मक कैटलॉग तैयार किया जा चुका है, जिसमें वेद, गणित, खगोल, आयुर्वेद सहित अनेक विषय शामिल हैं। वर्ष 2018 से प्रत्येक विषय के लिए अलग कैटलॉग विकसित करने का निर्णय लिया गया। कार्यक्रम के अंत में श्वेता सिंह ने औपचारिक धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। इस अवसर पर देशभर से आए विद्वान, शोधकर्ता और विभिन्न क्षेत्रों के लोग उपस्थित रहे।

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