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बसंत पंचमी से पहले ‘सरस्वती चतुर्थी’: ज्ञान, अनुशासन और आत्मचिंतन का राष्ट्रीय आह्वान

प्रख्यात लेखक, शिक्षाविद् और सामाजिक-सांस्कृतिक चिंतक डॉ. बीरबल झा ने सरस्वती चतुर्थी पर किया संकल्प का आह्वान।

सरस्वती चतुर्थी: प्रख्यात लेखक, शिक्षाविद् और सामाजिक-सांस्कृतिक चिंतक डॉ. बीरबल झा ने देशभर के नागरिकों, छात्रों, शिक्षकों और शिक्षण संस्थानों से बसंत पंचमी से एक दिन पूर्व ‘सरस्वती चतुर्थी’ को आत्मचिंतन, अनुशासन और ज्ञान-वंदना के दिवस के रूप में मनाने का राष्ट्रीय आह्वान किया है। उनका कहना है कि यह पहल भारत की उस प्राचीन सभ्यतागत परंपरा से प्रेरित है, जिसमें किसी भी उत्सव से पहले तैयारी और किसी भी आरंभ से पहले संकल्प को विशेष महत्व दिया गया है।

सरस्वती चतुर्थी: संकल्प की भावना प्राचीन परंपरा में है

डॉ. झा ने स्पष्ट किया कि प्रस्तावित सरस्वती चतुर्थी की अवधारणा की जड़ें प्राचीन गुरुकुल परंपरा और भारतीय दर्शन में निहित ‘संकल्प’ की भावना से जुड़ी हैं। उनके अनुसार, भारत में पूजा से पहले तैयारी, आनंद से पहले चिंतन और उत्सव से पहले आत्मशुद्धि की परंपरा रही है। इसी परंपरा को पुनर्जीवित करने का प्रयास सरस्वती चतुर्थी के माध्यम से किया जा रहा है।

डॉ. बीरबल झा  के शब्दों में, “भारत में उत्सव से पहले तैयारी की परंपरा रही है। हम पूजा से पहले तैयारी करते हैं, आनंद से पहले चिंतन करते हैं और उत्सव से पहले आत्मशुद्धि। सरस्वती चतुर्थी हमारी शैक्षिक और सांस्कृतिक चेतना में उस चिंतनशील अनुशासन को पुनर्जीवित करने का प्रयास है।”

सरस्वती चतुर्थी: संकल्प से आध्यात्मिक और बौद्धिक भूमिका तैयार होगी

उल्लेखनीय है कि बसंत पंचमी को देशभर में देवी सरस्वती—ज्ञान, विद्या, भाषा, संगीत और कला की अधिष्ठात्री देवी—के पावन पर्व के रूप में मनाया जाता है। डॉ. झा का मानना है कि बसंत पंचमी से एक दिन पूर्व सरस्वती चतुर्थी का आयोजन इस पर्व के लिए एक आध्यात्मिक और बौद्धिक भूमिका तैयार करेगा, जिससे ज्ञान के उत्सव को अधिक गहराई और अर्थ मिल सके।

उन्होंने कहा, “बसंत पंचमी ज्ञान का उत्सव है, जबकि सरस्वती चतुर्थी उसकी तैयारी का अवसर हो सकती है। ज्ञान तभी फलता-फूलता है, जब उसे विनम्रता और सजगता के साथ अपनाया जाए।”

इस राष्ट्रीय आह्वान के अंतर्गत सुझाव दिया गया है कि सरस्वती चतुर्थी को छात्र और शिक्षक अपने शैक्षिक जीवन पर आत्ममंथन, आजीवन अध्ययन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के नवीनीकरण तथा अनुशासन, जिज्ञासा, विनम्रता और कृतज्ञता जैसे मूल्यों के विकास के अवसर के रूप में मनाएं। इसके साथ-साथ पुस्तकों और अध्ययन सामग्री को खरीदने, संजोने, व्यवस्थित करने और उनका सम्मान करने पर भी विशेष बल दिया गया है।

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डॉ. झा ने यह भी स्पष्ट किया कि यह पहल किसी भी विद्यमान धार्मिक या सांस्कृतिक परंपरा को बदलने या चुनौती देने के उद्देश्य से नहीं है। उनका कहना है कि इसका लक्ष्य बसंत पंचमी के उत्सव को भारतीय दर्शन में निहित तैयारी की भावना से और अधिक समृद्ध बनाना है।

उनके अनुसार, “यह परंपराओं में बदलाव का नहीं, बल्कि उन्हें और अर्थपूर्ण बनाने का प्रयास है। जब तैयारी का भाव जुड़ता है, तब उत्सव भी गहराई प्राप्त करता है।”

शिक्षण संस्थानों को “आधुनिक भारत के ज्ञान-मंदिर” बताते हुए डॉ. बीरबल झा ने विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों से इस आयोजन को अपनाने में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि शिक्षा को केवल रोजगार तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि इसे व्यक्तित्व, संस्कृति और चेतना के निर्माण की सतत प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए।

डॉ. झा के शब्दों में, “शिक्षा को केवल रोजगार तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। यह व्यक्तित्व, संस्कृति और चेतना के निर्माण की प्रक्रिया है। सरस्वती चतुर्थी छात्रों को यह स्मरण दिला सकती है कि शिक्षा एक आजीवन साधना है।”

उन्होंने विश्वास जताया कि यह पहल भारत की ज्ञान-परंपरा को और सुदृढ़ करेगी तथा आने वाली पीढ़ियों को गरिमा, अनुशासन और श्रद्धा के साथ अध्ययन के लिए प्रेरित करेगी।

यह राष्ट्रीय आह्वान डॉ. बीरबल झा द्वारा, उनकी भूमिकाओं—प्रबंध निदेशक, ब्रिटिश लिंगुआ तथा अध्यक्ष, मिथिलालोक फाउंडेशन—के तहत जारी किया गया है। दोनों संस्थाएँ शिक्षा, भाषा और सांस्कृतिक चेतना के क्षेत्र में सक्रिय योगदान के लिए जानी जाती हैं।

आह्वान के अंत में नागरिकों से आग्रह किया गया है कि वे उत्सव से पहले तैयारी करें, आनंद से पहले चिंतन करें और घोषणा से पहले अध्ययन करें। जय माँ शारदे” के साथ यह राष्ट्रीय अपील संपन्न होती है।

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