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नया साल, नई चेतावनी: क्या पर्यावरण संरक्षण अब विकल्प नहीं, मजबूरी बन चुका है?

पर्यावरण संरक्षण: अपना पर्यावरण बचाने के लिए देश के हर नागरिक को आगे आना होगा। (फोटो- Meta AI)

पर्यावरण संरक्षण: नए साल का आगमन हम सभी के जीवन में नई उम्मीदें, नए लक्ष्य और नए संकल्प लेकर आता है। यह वह समय होता है जब हम अपने अतीत की कमियों से सीख लेकर भविष्य को बेहतर बनाने का निर्णय करते हैं। ऐसे में नए साल का सबसे महत्वपूर्ण संकल्प पर्यावरण संरक्षण होना चाहिए, क्योंकि प्रकृति का संतुलन ही हमारे जीवन की आधारशिला है।

पर्यावरण संरक्षण केवल पेड़ लगाने या प्लास्टिक का उपयोग कम करने तक सीमित नहीं है। यह एक व्यापक अवधारणा है, जिसमें जल, वायु, भूमि, ऊर्जा और प्राकृतिक संसाधनों का संतुलित और जिम्मेदार उपयोग शामिल है। यदि हम छोटे-छोटे कदमों से शुरुआत करें, तो बड़ा बदलाव संभव है।

पर्यावरण संरक्षण: जल संकट सबसे बड़ी चुनौती

आज देश गंभीर जल संकट से जूझ रहा है। भारत में प्रति व्यक्ति औसतन केवल 140 लीटर पानी प्रतिदिन उपलब्ध है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार यह मात्रा 200 लीटर होनी चाहिए। देश के 85–90 प्रतिशत गांव भूजल पर निर्भर हैं। ऐसे में तालाबों का पुनर्जीवन, वर्षा जल संचयन और जल के अनुशासित उपयोग को जनआंदोलन बनाना समय की मांग है। सरकार ने अपनी भूमिका स्पष्ट कर दी है, अब समाज की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है।

पर्यावरण संरक्षण: वायु प्रदूषण यानी खुली सांस पर संकट

वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है। बढ़ते वाहन, अनियंत्रित औद्योगिक गतिविधियां, ईंट भट्टे, खुले में कूड़ा और प्लास्टिक जलाना—ये सभी वायु की गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहे हैं। खराब वायु गुणवत्ता का सीधा संबंध हृदय रोग, फेफड़ों के कैंसर, दमा और श्वसन रोगों से है। स्वच्छ हवा के लिए हमें स्वयं जिम्मेदारी लेते हुए दूसरों को भी जागरूक करना होगा।

पर्यावरण संरक्षण: प्लास्टिक प्रदूषण मतलब मौन विनाश

एकल उपयोग वाले प्लास्टिक और पॉलीथीन ने पर्यावरण को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है। यह मिट्टी में नहीं घुलता, जल स्रोतों के माध्यम से समुद्र तक पहुंचता है और समुद्री जीव-जंतुओं के लिए जानलेवा साबित होता है। अनुमान है कि करीब 700 प्रजातियां प्लास्टिक प्रदूषण से प्रभावित हैं और हर साल लाखों जीव इसकी वजह से मारे जाते हैं। नए साल में यह संकल्प जरूरी है कि हम सिंगल यूज़ प्लास्टिक का बहिष्कार करेंगे।

पेड़ और हरियाली: जीवन की सांस

देश में घटती हरियाली चिंता का विषय है। पेड़ कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर वातावरण को संतुलित रखते हैं। हरियाली की कमी से मौसम चक्र बिगड़ रहा है और प्रदूषण बढ़ रहा है। प्रत्येक नागरिक को वृक्षारोपण को अपनी जिम्मेदारी माननी होगी, ताकि आने वाली पीढ़ियों को शुद्ध हवा और सुरक्षित पर्यावरण मिल सके।

कचरा प्रबंधन और ऊर्जा संरक्षण

घरेलू कचरे का सूखा-गीला अलगाव, रीसाइक्लिंग को बढ़ावा, बायोडिग्रेडेबल विकल्पों का उपयोग और अनावश्यक बिजली खपत पर रोक बेहद जरूरी है। एलईडी बल्बों का प्रयोग, उपयोग न होने पर उपकरणों को अनप्लग करना और ऊर्जा दक्ष उपकरण अपनाना छोटे लेकिन प्रभावी कदम हैं।

इन सभी प्रयासों से हम न केवल पर्यावरण की रक्षा कर सकते हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वस्थ, सुरक्षित और हरित भविष्य भी सुनिश्चित कर सकते हैं। याद रखें, हर व्यक्ति का योगदान मायने रखता है – आपका छोटा सा कदम भी बड़ा बदलाव ला सकता है।

भारत में पर्यावरण संरक्षण को लेकर सरकार और समाज—दोनों स्तरों पर सोच और प्रयास धीरे-धीरे मजबूत हो रहे हैं। केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय कार्ययोजना on Climate Change (NAPCC), स्वच्छ भारत मिशन, नमामि गंगे, जल जीवन मिशन, राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रम और एकल-उपयोग प्लास्टिक पर प्रतिबंध जैसी योजनाओं के जरिए पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने की दिशा तय की है। नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में भारत ने सौर और पवन ऊर्जा को बढ़ावा देकर कार्बन उत्सर्जन कम करने की प्रतिबद्धता भी दिखाई है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत जलवायु न्याय और सतत विकास की वकालत करता रहा है।

सामाजिक स्तर पर आम लोगों की सोच में भी बदलाव दिखाई दे रहा है। स्वच्छता, जल संरक्षण और प्लास्टिक के दुष्प्रभावों को लेकर जागरूकता बढ़ी है, खासकर युवाओं और शहरी वर्ग में। हालांकि, व्यवहारिक स्तर पर अभी भी उपभोग की आदतों और लापरवाही बड़ी चुनौती बनी हुई है। पर्यावरण संरक्षण को जन-आंदोलन बनाए बिना सरकारी योजनाओं की सफलता सीमित रहेगी।

प्रशांत सिन्हा | वरिष्ठ पर्यावरणविद् एवं सामाजिक कार्यकर्ता

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