Small Rivers Crisis: हमारी विशाल नदियां जीवन का आधार हैं, लेकिन उनकी जीवन-रेखाएं — यानी छोटी नदियां — तेजी से सूख रही हैं। यदि छोटी नदियों को नहीं बचाया गया, तो बड़ी नदियों को बचाने के सारे प्रयास अधूरे और दिखावटी साबित होंगे।
छोटी नदियां केवल पानी की पतली धाराएं नहीं होतीं। वे भूजल को रिचार्ज करती हैं, खेतों की मिट्टी को उपजाऊ बनाती हैं, बाढ़ को नियंत्रित करती हैं और आसपास के पर्यावरण को संतुलित रखती हैं। प्रदूषण, अतिक्रमण, अवैध बालू-खनन और सरकारी लापरवाही ने इन्हें लगभग मृतप्राय बना दिया है। जलवायु परिवर्तन का सबसे पहला और गहरा असर भी इन्हीं छोटी धाराओं पर पड़ा है, जो कई जगह रेतीले मैदान में बदलती जा रही हैं।
Small Rivers Crisis: भारत में नदियों को ‘मां’ कहा जाता है
मानव इतिहास में नदियों का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। भारत में नदियों को ‘मां’ कहकर पुकारा गया, क्योंकि वे हमारे जीवन और सभ्यता की आधारशिला रही हैं। कभी लोगों का दिन नदी तट से शुरू होता था। नदियां हमारे जीवन का पोषण करती थीं और उनके किनारे सभ्यताएं विकसित होती थीं।
लेकिन जब घरों तक पानी नलों के माध्यम से पहुंचने लगा, तब नदियों, झीलों और कुओं का महत्व धीरे-धीरे कम होने लगा। धार्मिक आस्था के कारण लोग नदियों से जुड़े अनुष्ठानों के प्रति तो सजग रहे, पर उनकी स्वच्छता और प्रवाह बनाए रखने की जिम्मेदारी से दूर होते गए। परिणामस्वरूप नदियों की स्थिति बिगड़ती चली गई।
Small Rivers Crisis: सबसे अधिक उपेक्षा छोटी नदियों की हुई
सबसे अधिक उपेक्षा छोटी नदियों की हुई। उनका प्रवाह क्षेत्र छोटा था, इसलिए वे धीरे-धीरे नालों में बदल दी गईं। आज बड़ी नदियों के जलप्रवाह में कमी का एक बड़ा कारण इन्हीं छोटी नदियों की दुर्दशा है।
हम Ganga और Yamuna जैसी बड़ी नदियों को स्वच्छ रखने के लिए अभियान चलाते हैं, पर यह भूल जाते हैं कि ये नदियां सैकड़ों छोटी नदियों के संगम से ही विशाल बनती हैं।
देश में आज भी लगभग 12 हजार छोटी नदियां उपेक्षा का शिकार हैं। कभी बिहार में हजारों नदियां हिमालय से उतरती थीं, लेकिन आज उनमें से बहुत कम बची हैं। मधुबनी और सुपौल की तिलयुगा नदी, जो कभी कोसी नदी से भी विशाल मानी जाती थी, आज सिमटकर उसकी सहायक नदी बनकर रह गई है। सीतामढ़ी की लखनदेई नदी अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुकी है।
मध्य प्रदेश की दूधी नदी, जो कभी बारहमासी मानी जाती थी, अब सिकुड़ रही है। सहारनपुर की पांवधोई नदी गंदे नाले में बदल गई थी, हालांकि जनजागरण से उसमें सुधार आया है। लेकिन काली, हिंडन और गुनता जैसी नदियां अब भी अपने पुनर्जीवन की प्रतीक्षा कर रही हैं।
छोटी नदियां केवल जलधाराएं नहीं, बल्कि उनके किनारे बसता समाज, किसान, मछुआरे और पूरा पारिस्थितिकी तंत्र उनसे जुड़ा होता है। जब छोटी नदियां बीमार होती हैं, तो तालाब, कुएं और भूजल सब प्रभावित होते हैं। जलवायु परिवर्तन के दौर में छोटी नदियां धरती का तापमान संतुलित रखने, मिट्टी की नमी बनाए रखने और हरियाली को सुरक्षित रखने में अहम भूमिका निभाती हैं।
यदि हम अतिक्रमण हटाएं, अवैध बालू खनन रोकें, समय-समय पर सफाई और गहराई बढ़ाने का कार्य करें और इन नदियों को अपनी धरोहर मानकर सहेजें, तो पर्यावरण और समाज दोनों का भविष्य सुरक्षित होगा।
हम तेजी से जल संकट की ओर बढ़ रहे हैं। यदि अभी नहीं जागे, तो बड़ी मुसीबत सामने होगी। छोटी नदियां बचेंगी, तभी बड़ी नदियां बचेगी।इसी में हमारी सभ्यता और भविष्य की सुरक्षा निहित है।
भारत में कई प्रमुख नदियां गंभीर संकट का सामना कर रही हैं, जिनमें प्रदूषण, अतिक्रमण, अवैध खनन, बांध निर्माण और जलवायु परिवर्तन प्रमुख कारण हैं। यमुना (Ganga tributaries drying) देश की सबसे प्रदूषित नदियों में मानी जाती है, जबकि गंगा की स्थिति उसकी सहायक नदियों के सूखने और बढ़ते सीवेज प्रवाह के कारण चिंताजनक बनी हुई है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की हिंडन नदी औद्योगिक कचरे से बुरी तरह प्रभावित है, वहीं साबरमती नदी का प्राकृतिक प्रवाह काफी हद तक कृत्रिम जल आपूर्ति पर निर्भर हो गया है। कोसी नदी बाढ़ और अव्यवस्थित तटबंधों की समस्या से जूझ रही है, जबकि गोदावरी नदी और महानदी पर बड़े बांधों और औद्योगिक दबाव का असर दिखाई देता है; हालांकि सबसे ज्यादा खतरे में वे छोटी और सहायक नदियाँ हैं, जिनके सूखने से बड़ी नदियों का अस्तित्व भी संकट में पड़ता जा रहा है।
प्रशांत सिन्हा | वरिष्ठ पर्यावरणविद् एवं सामाजिक कार्यकर्ता

CMARG (Citizen Media And Real Ground) is a research-driven media platform that focuses on real issues, timely debates, and citizen-centric narratives. Our stories come from the ground, not from the studio — that’s why we believe: “Where the Ground Speaks, Not the Studios.” We cover a wide range of topics including environment, governance, education, economy, and spirituality, always with a public-first perspective. CMARG also encourages young minds to research, write, and explore bold new ideas in journalism.




