Heritage and Tradition
Cultural

दूर हुए खजूर, पुराण से कुरान तक में है खूबियों की चर्चा

परंपराएं हमारे जीवन को दिशा देती हैं तो पूर्वजों के प्रति श्रद्धाभाव को भी बढ़ाती हैं। लेकिन जो सबसे महत्वपूर्ण काम करती हैं, वह है जड़ों से जोड़ने का। जरा खजूर और खजूर के पेड़ की तरफ अपना ध्यान केंद्रित करें तो आपको पता चलेगा कि यह पेड़ कैसे हमारी परंपराओं, संस्कृति और आचरण से जुड़ा है। खजूर कुदरत का वह बेशकीमती हीरा है, जिसकी महत्ता न केवल हिंदू धर्म में बताई गई है, बल्कि इस्लाम, क्रिश्चियन और अन्य धर्मों में भी उसे उतना ही सम्मान दिया गया है। दुखद यह है कि गांवों से यह हीरा खत्म हो रहा है आज इसको बचाने की जरूरत है, इस पेड़ को अधिक से अधिक संख्या में लगाने की आवश्यकता है और नई पीढ़ी को इसकी खूबियों से परिचित कराने की दरकार है। खजूर के पेड़ के फायदे को देखते हुए भारत सरकार ने खजूर अनुसंधान विभाग बनाया है, जो किसानों को इसकी खेती करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। राजस्थान समेत कई राज्यों में किसानों ने इसकी खेती करने की ओर अपना झुकाव भी दिखाया है। खजूर की खेती फायदे का धंधा है। एक समय हर गांव में खजूर के बड़े-बड़े हरे-हरे पेड़ हुआ करते थे।

खजूर के पेड़ की निगाह में देवी-देवता, राजा-प्रजा, हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई, अमीर-गरीब सब बराबर हैं। खजूर गरीबों का गुड़ है। देश के लाखों गरीब को रोटी देता है। इस बारे में सामाजिक परंपराओं और परिवेश के विशेषज्ञ तथा जल योद्धा, सर्वोदय कार्यकर्ता उमा शंकर पांडेय बताते हैं कि इस रहस्यमयी पेड़ के बारे में पुरान (पुराण), कुरान, बाइबिल में बहुत कुछ कहा गया है। खजूर को अलग-अलग देशों और धर्मों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। अरबी भाषा में इसे नख्ल कहते हैं, फारसी में खरमा एवं हिंदी में खजूर कहते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम फिनिक्स डिक्लोफिरा है।

जन्म से लेकर जीवन के अंतिम दिन तक खजूर मानव जीवन से जुड़ा है। विवाह संस्कार में इससे बना मुकुट, सेहरा, मउर लगाना हमारी परंपरा से जुड़ा है। विवाह चाहे राजा का हो, प्रजा का हो, गरीब का हो, रईस का हो, वर-वधू के सिर पर इसका होना अत्यंत शुभ माना गया है। खजूर के बने झाड़ू केवल घर की गांदगी ही नहीं साफ करते हैं, वह घर में लक्ष्मी के वास के लिए पवित्रता भी लाते हैं। सामाजिक समरसता का संदेश भी देते हैं। दूसरी ओर अपने फल से यह हमें भोजन, दवा देता है और सामाजिक एकता और अपनत्व सिखाता है।

समाज विशेषज्ञ उमा शंकर पांडेय बताते हैं कि खजूर एक ऐसा पेड़ है जो गर्म जलवायु में पैदा होता है। विशेषकर बुंदेलखंड के गांव में बचपन से इसे देख रहे हैं। पेड़ की उम्र 15 से 72 वर्ष होती है। इस पेड़ के एक गुच्छे में 1000 से अधिक फल होते हैं। इसके फल लाल, काले, भूरे, बेलन, आकार के होते हैं। एक पेड़ में 40 से 75 किलो तक फल लगते हैं। इसकी खेती इराक, ईरान, सऊदी अरब, मिस्र, सूडान, लीबिया, अरब देशों आदि में होती है। इसके फल का वजन 5 ग्राम से 20 ग्राम तक का होता है। भारत खजूर का सबसे बड़ा आयातक देश है। हिंदू धर्म विवाह संहिता में खजूर की मौर से हुई शादी को वर-वधू दोनों के लिए फलदायी माना जाता है। इस्लाम धर्म में खजूर का विशेष महत्व है। रमजान के दौरान खजूर खाकर मुस्लिम भाई रोजा खोलते हैं। हजरत मोहम्मद साहब खजूर से अपना रोजा खोलते थे। बाइबिल ने इंसान की तुलना खजूर के पेड़ से की है। खजूर खाने से पेट का पाचन तंत्र मजबूत रहता है, शरीर में रक्त की कमी दूर होती है। धर्माचार्यों के मत के अनुसार जिस वर-वधू का विवाह खजूर के मौर को धारण करके हुआ है, वह विवाह लंबे वैवाहिक जीवन का संकेत करता है। वर-वधू दोनों के परिवार में रिश्ते मजबूत रहते हैं। खजूर रिश्तों और संबंधों को जोड़ता है। समाज मे प्रेम पैदा करता है। दो अंजान व्यक्तियों के बीच में अपनत्व पैदा करता है।

यह पेड़ कई हजार बरस पुराना है। यही एकमात्र पेड़ है, जिसकी पत्तियां कभी झड़ती नहीं हैं। हर ऋतु में एक ही रहती है। आयुर्वेद तथा वैद्यक शास्त्र में विभिन्न उपचार के लिए इस पेड़ के फलों, पत्तों, जड़ को महत्वपूर्ण माना गया है। इस पेड़ के पत्तों से चटाई, झाड़ू, रस्सी, सेहरा, राजमुकुट सदियों से बनता चला आ रहा है। यह हस्तशिल्प का उत्कृष्ट नमूना है। अब इस पेड़ के लगातार खत्म होते जाने से शायद नई पीढ़ी को गांव में अपनी शादी में इसके मऊर या सेहरा बांधने को ना मिले। बाजार में नकली और सस्ते सेहरे बहुतायत में आ गए हैं। इसीलिए रहीम दास जी ने कहा था, “बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर, पंछी को छाया नहीं फल लागे अति दूर।” खजूर का सेहरा 200 रुपए से हजार रुपए तक में मिलता है। इसे गांव के परंपरागत कारीगर ही बनाते हैं। उमा शंकर पांडेय के मुताबिक उनके गांव बांदा जिले के जखनी में इसके पत्तों का मऊर यहा सेहरा विवाह के 24 घंटे पहले तैयार किया जाता है। वहां इसे साफा नहीं कहते है।

वैसे तो खजूर सालभर बिकता है, लेकिन रमजान के महीने में इसके फल की खपत बढ़ जाती है। खास खजूर की कीमत 5300 प्रति किलो है। मध्यम खजूर की कीमत 1250 रुपए प्रति किलो है। देसी खजूर चटाई 100 से 200 रुपए किलो बिकता है। आम तौर पर यह मुंबई से आता है। खास बात यह है कि खजूर गरीब की रोटी से जुड़ा है। देश के लाखों गरीब इसके बने झाड़ू या पंखा, डलिया, चटाई, पंखा, रस्सी और बर्तन बनाकर बेचते हैं और इसी से उनकी जीविका चलती है। हस्तशिल्प का यह बेजोड़ नमूना है। यह गरीबों का गुड़ है तो अमीरों का मेवा भी है। इससे दवाइयां भी बनती हैं। परंपरागत खजूर के पेड़ के 500 से अधिक उपयोग बताए गए हैं। दुकान में मिलने वाले खजूर तथा पेड़ के ताजे खजूर के स्वाद में बहुत अंतर होता है।

उमा शंकर पांडेय कहते हैं कि “सर्वोदय कार्यकर्ता होने के नाते हमने बहुत गांव-गांव यात्रा की है। खजूर के बड़े-बड़े पेड़ देखे हैं। यदि समय रहते नहीं चेते और खजूर के पेड़ को नहीं बचाया गया तो भविष्य की पीढ़ी देसी खजूर या खजूर के झाड़ू तक देखने को तरसेगी। तब यह केवल किताबों में पढ़ने को मिलेगा और तस्वीरों में दिखाई देगा। किसानों को खजूर की खेती करनी चाहिए। दुनिया में खजूर की मांग है और व्यापारियों के लिए यह फायदे का सौदा है।

(यह लेख मूलरूप से जनसत्ता ऑनलाइन में प्रकाशित है। वहां से साभार लिया गया है।)

cmarg author

Sanjay Dubey is Graduated from the University of Allahabad and Post Graduated from SHUATS in Mass Communication. He has served long in Print as well as Digital Media. He is a Researcher, Academician, and very passionate about Content and Features Writing on National, International, and Social Issues. Currently, he is working as a Digital Journalist in Jansatta.com (The Indian Express Group) at Noida in India. Sanjay is the Director of the Center for Media Analysis and Research Group (CMARG) and also a Convenor for the Apni Lekhan Mandali.

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