World Radio Day: मानव सभ्यता के इतिहास में कुछ आविष्कार मात्र यांत्रिक उपलब्धियां नहीं होते, वे मनुष्य की चेतना के विस्तार बन जाते हैं। रेडियो ऐसा ही एक अद्भुत ‘शब्द-शिल्प’ है, जिसने भौतिक दूरियों को संवेदनाओं के सेतु से जोड़ दिया। प्रतिवर्ष 13 फरवरी को जब दुनिया ‘विश्व रेडियो दिवस’ मनाता है, तब वह केवल एक तकनीकी माध्यम का उत्सव नहीं मनाता, बल्कि उस अदृश्य जादुई धागे का अभिनंदन करता है, जिसने पूरी पृथ्वी को एक वैश्विक गांव (Global Village) में पिरो दिया है।
रेडियो शून्य से संवाद तक की मनुष्य की महायात्रा का सजीव प्रतीक है। एक ऐसी यात्रा, जहां हवाएं बोलती हैं और ईथर की लहरें इतिहास के पृष्ठ लिखती हैं। यह माध्यम निराकार होकर भी आत्मीय है, अदृश्य होकर भी अत्यंत प्रभावी। इसकी तरंगों ने सीमाओं को लांघा, भाषाओं को जोड़ा और विविध संस्कृतियों के बीच संवाद का पुल निर्मित किया।
रेडियो केवल एक यंत्र नहीं, न ही मात्र मनोरंजन का साधन है। यह सभ्यता का सहयात्री है, जिसने युद्धों की गर्जना सुनी, स्वतंत्रता आंदोलनों की पुकार को स्वर दिया, नवस्वतंत्र राष्ट्रों के स्वप्नों को आकार लेते देखा, और आज भी डिजिटल युग के कोलाहल के बीच अपनी गरिमामयी, विश्वसनीय और मानवीय उपस्थिति बनाए हुए है। दरअसल, रेडियो ध्वनि का वह लोकतंत्र है, जहां हर आवाज़ को स्थान मिलता है। चाहे वह महानगर की चकाचौंध हो या गांव की मिट्टी की महक। यही उसकी कालजयी शक्ति है, यही उसका वैश्विक स्पंदन।
World Radio Day: विश्व रेडियो दिवस और यूनेस्को की दूरदर्शी उपलब्धि
रेडियो एक ऐसा संचार माध्यम है जो न चेहरों की पहचान करता है, न भौगोलिक सीमाओं को मानता है।फिर भी हर दिल की धड़कन से जुड़ जाता है। अदृश्य होते हुए भी अत्यंत प्रभावशाली इस माध्यम के सम्मान में प्रतिवर्ष 13 फ़रवरी को पूरी दुनिया विश्व रेडियो दिवस मनाती है। यह दिवस केवल एक तकनीक का उत्सव नहीं, बल्कि संवाद की शक्ति, लोकतांत्रिक चेतना और सांस्कृतिक विविधता की विजय-घोषणा है।
यूनेस्को (UNESCO) ने वर्ष 2011 में 13 फ़रवरी को विश्व रेडियो दिवस (World Radio Day) के रूप में घोषित किया, जिसे 2012 से वैश्विक स्तर पर मनाया जाने लगा। इस तिथि का चयन ऐतिहासिक महत्व रखता है, क्योंकि 13 फ़रवरी 1946 को ही संयुक्त राष्ट्र रेडियो (UN Radio) की स्थापना हुई थी जो, अंतरराष्ट्रीय संवाद, शांति और सूचना प्रसार की दिशा में एक युगांतकारी पहल थी।
यूनेस्को रेडियो को लोकतंत्र की आत्मा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रहरी और सूचना तक समान पहुंच का सशक्त माध्यम मानता है। रेडियो स्थानीय भाषाओं, लोक-संस्कृतियों और हाशिए पर खड़े समुदायों की आवाज़ बनकर उन्हें वैश्विक संवाद से जोड़ता है। यही कारण है कि यूनेस्को रेडियो को केवल ब्रॉडकास्टिंग का साधन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और सामाजिक समावेशन के सशक्त वाहक के रूप में देखता है।
विश्व रेडियो दिवस के माध्यम से यूनेस्को स्वतंत्र पत्रकारिता, सामुदायिक रेडियो और सार्वजनिक प्रसारण की उस भूमिका को रेखांकित करता है, जो सूचना के शोर और अफवाहों के बीच भी विश्वसनीयता, संतुलन और संवेदनशीलता बनाए रखते हैं। डिजिटल युग की तेज़ और चकाचौंध भरी रफ्तार के बीच यह दिवस यूनेस्को की उसी दूरदर्शिता का प्रमाण है, जिसने रेडियो की शांत, भरोसेमंद और मानवीय शक्ति को वैश्विक पहचान दिलाई। विश्व रेडियो दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि तकनीक चाहे जितनी उन्नत क्यों न हो जाए, आवाज़ की आत्मीयता, संवेदना और विश्वास आज भी रेडियो में पूरी जीवंतता के साथ धड़कते हैं।
World Radio Day: मारकोनी के स्वप्न का वैश्विक विस्तार
रेडियो का जन्म भले ही विज्ञान की प्रयोगशालाओं में हुआ हो, पर उसकी आत्मा ने जन-जन के मन में अपना स्थायी निवास पाया। उन्नीसवीं सदी के अस्त होते सूर्य और बीसवीं सदी की उदय होती भोर के बीच, जब गुग्लिएल्मो मारकोनी ने बेतार तरंगों पर संकेतों को प्रवाहित किया, तब मानव इतिहास ने संचार की एक नई भाषा सीख ली। 1895 में भेजा गया उनका पहला वायरलेस सिग्नल विज्ञान की दृष्टि से भले ही एक छोटी उपलब्धि प्रतीत होता हो, किंतु उसी क्षण से संचार का समूचा परिदृश्य हमेशा के लिए बदल गया।
भारत में इस क्रांतिकारी तकनीक की वैचारिक और वैज्ञानिक नींव आचार्य जगदीश चंद्र बसु के मौलिक अनुसंधानों ने रखी। बीसवीं सदी के तीसरे दशक में जब देश में नियमित रेडियो प्रसारण आरंभ हुआ, तो रेडियो केवल एक उपकरण नहीं रहा, वह भारतीय घरों के ड्राइंग रूम का आत्मीय सदस्य बन गया। ‘रेडियो क्लब ऑफ बॉम्बे’ से प्रारंभ हुआ यह ऐतिहासिक सफर आगे चलकर ‘आकाशवाणी’ (All India Radio) के रूप में एक ऐसे विराट वट वृक्ष में परिवर्तित हुआ, जिसकी छांव में आज भी करोड़ों भारतीय अपनी भाषा, संस्कृति और स्मृतियों की जड़ों को सींचते हैं।
वह दौर आज भी स्मृतियों में जीवित है,जब रेडियो के ऊपर सजा हुआ एंटीना और हाथों से घुमाया जाने वाला ट्यूनिंग नॉब घर की सबसे कीमती धरोहर हुआ करते थे। उन तरंगों के साथ केवल समाचार या गीत ही नहीं बहते थे, बल्कि समय, संवेदना और साझा अनुभवों की एक पूरी दुनिया घर-घर पहुंचती थी। यह Importance of Radio थी।
World Radio Day: स्वतंत्रता संग्राम की ‘आज़ाद’ आवाज
भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में रेडियो की भूमिका किसी सशस्त्र सेना से कम प्रभावशाली नहीं थी। जब ब्रिटिश हुकूमत ने प्रेस पर पहरे बिठा दिए थे और सार्वजनिक सभाओं पर प्रतिबंध लगा दिया था, तब रेडियो ही वह अदृश्य अस्त्र बना जिसने राष्ट्रभक्ति की ज्वाला को निरंतर प्रज्वलित रखा। उसकी तरंगें भले ही आंखों से ओझल थीं, किंतु उनका प्रभाव साम्राज्यवादी सत्ता की नींव तक पहुंचता था।
1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान उषा मेहता और उनके साथियों द्वारा संचालित ‘कांग्रेस रेडियो’ ने अंग्रेजी शासन की नींद हराम कर दी थी। गुप्त ठिकानों और सुदूर स्थानों से प्रसारित होने वाली ये आवाज़ें केवल समाचार नहीं देती थीं, बल्कि संघर्ष, साहस और एकता का संदेश भी जन-जन तक पहुंचाती थीं। उन तरंगों में स्वतंत्रता का स्वप्न धड़कता था और हर प्रसारण भारतीयों के हृदय में नई चेतना का संचार करता था।
History of Radio: “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा”
इसी प्रकार, जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने ‘आज़ाद हिंद रेडियो’ से अपनी ओजस्वी पुकार “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा” के साथ राष्ट्र को संबोधित किया, तो वह केवल एक उद्घोष नहीं था, बल्कि क्रांति की गर्जना थी जिसने ब्रिटिश साम्राज्यवाद की नींव को कंपा दिया।रेडियो ने उस कालखंड में यह सिद्ध कर दिया कि विचारों को सलाखों में कैद नहीं किया जा सकता, और न ही सीमाओं की दीवारें उन्हें रोक सकती हैं। उसकी अदृश्य तरंगों ने यह प्रमाणित किया कि आवाज़ जब सत्य और स्वाधीनता के लिए उठती है, तो वह किसी भी साम्राज्य से अधिक शक्तिशाली हो जाती है।
World Radio Day: सामाजिक चेतना: लोकतंत्रीकरण का सबसे सशक्त माध्यम
रेडियो ने भारतीय समाज के लोकतंत्रीकरण में जो भूमिका निभाई है, वह अद्वितीय और ऐतिहासिक है। इस माध्यम ने साक्षरता की अनिवार्य शर्त को समाप्त कर दिया। जहां समाचार-पत्र पढ़ने के लिए अक्षर-ज्ञान आवश्यक था, वहीं रेडियो ने एक निरक्षर किसान को भी उतनी ही सहजता से दुनिया से जोड़ा, जितना किसी विद्वान को। सुनने की यह लोकतांत्रिक शक्ति ही रेडियो की सबसे बड़ी उपलब्धि रही है।
World Radio Day: समानता का स्वर
रेडियो ने जाति, धर्म और वर्ग की दीवारों को तोड़ते हुए एक ‘साझा श्रवण संस्कृति’ का निर्माण किया। गांव की चौपाल पर एक ट्रांजिस्टर के चारों ओर जुटा पूरा गांव अपने आप में सामाजिक समरसता का दृश्य था। वहां ऊंच-नीच और भेदभाव की रेखाएं स्वतः धुंधली हो जाती थीं।
History of radio:महिला सशक्तिकरण का माध्यम
ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में रेडियो ने स्वास्थ्य, स्वच्छता, मातृत्व, शिक्षा और कानूनी अधिकारों की जानकारी देकर महिलाओं को चौके-चूल्हे से आगे की दुनिया से परिचित कराया। ‘सखी-सहेली’ जैसे कार्यक्रमों ने घरेलू महिलाओं को न केवल जानकारी दी, बल्कि उन्हें अपनी बात कहने का मंच भी प्रदान किया।
कम्युनिटी रेडियो ने स्थानीय बोलियों, लोक-संस्कृतियों और क्षेत्रीय समस्याओं को स्वर देकर उस अंतिम व्यक्ति को मुख्यधारा से जोड़ा, जिसकी आवाज़ प्रायः बड़े मीडिया मंचों तक नहीं पहुंच पाती थी। रेडियो यहां केवल माध्यम नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व बन गया।
रेडियो भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में केवल मनोरंजन का साधन नहीं रहा, बल्कि विकास का विश्वसनीय साथी बना। ‘कृषि जगत’ और ‘किसान वाणी’ जैसे कार्यक्रमों ने प्रयोगशालाओं में जन्मे वैज्ञानिक ज्ञान को सीधे खेत की मेड़ तक पहुंचाया।
1960 के दशक में हरित क्रांति को सफल बनाने में रेडियो का योगदान अमूल्य रहा। उन्नत बीजों, उर्वरकों के संतुलित उपयोग और आधुनिक सिंचाई तकनीकों की जानकारी रेडियो तरंगों के माध्यम से गांव-गांव पहुंची और उत्पादन में ऐतिहासिक वृद्धि का आधार बनी।
मौसम का सटीक पूर्वानुमान और मंडियों के भाव की सूचना देकर रेडियो ने किसानों को बिचौलियों के शोषण से बचाया। आज भी सुदूर अंचलों में किसान रेडियो के आधार पर यह निर्णय करता है कि फसल कब और कहां बेची जाए।
भारतीय शास्त्रीय संगीत, लोकगीत, नाटक और साहित्य को जीवित रखने में रेडियो की भूमिका अतुलनीय रही है। उसने कला को अभिजात वर्ग की सीमा से निकालकर जनसाधारण तक पहुंचाया।
भारत में रेडियो: विविध भारती का स्वर्ण युग
1957 में आरंभ हुई ‘विविध भारती’ सेवा ने पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को एक ही सांस्कृतिक लय में बांध दिया। अमीन सयानी की “भाइयो और बहनो…” वाली जादुई पुकार ने फिल्मी गीतों को घर-घर की धड़कन बना दिया। ‘बिनाका गीतमाला’ केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय अनुष्ठान बन चुकी थी।
रेडियो नाटक: शब्दों से दृश्य तक: रेडियो नाटकों ने शब्दों से दृश्य रचने की कला को चरम पर पहुंचाया। ‘हवा महल’ जैसे कार्यक्रमों के पात्र श्रोताओं की कल्पना में सजीव हो उठते थे, जिससे कल्पनाशीलता और संवेदना दोनों समृद्ध होती थीं।
भाषा का परिष्कार: आकाशवाणी के उद्घोषकों का शुद्ध उच्चारण, संयमित लहजा और ओजस्वी वाणी हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के मानक स्वरूप को जन-जन तक पहुंचाने में सहायक बनी।
राजनीति और कूटनीति का सेतु: राजनीतिक संवाद में रेडियो ने सदैव एक सीधे पुल की भूमिका निभाई है। पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक, रेडियो सत्ता और जनता के बीच संवाद का विश्वसनीय माध्यम रहा है। ‘मन की बात’ इसका आधुनिक उदाहरण है, जिसने रेडियो को पुनर्जीवित कर उसे फिर से जनचर्चा के केंद्र में ला खड़ा किया।अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बीबीसी और वॉयस ऑफ अमेरिका जैसे प्रसारकों ने रेडियो को सॉफ्ट पावर के प्रभावी उपकरण के रूप में इस्तेमाल कर वैश्विक जनमत को दिशा दी।
आपदा का देवदूत, जीवन की रेखा: जब प्राकृतिक आपदाओं में बिजली के खंभे गिर जाते हैं, मोबाइल टावर ठप हो जाते हैं और इंटरनेट मौन हो जाता है, तब रेडियो ही ‘लाइफलाइन’ बनकर बचता है।
संकट का साथी: 2004 की सुनामी, केदारनाथ त्रासदी या हालिया चक्रवात हर संकट में दो बैटरी पर चलने वाला छोटा सा ट्रांजिस्टर लोगों को यह बताता रहा कि मदद कहां और कैसे मिलेगी।
स्वास्थ्य अभियानों का मूक योद्धा: पोलियो उन्मूलन से लेकर कोविड-19 महामारी तक, अफवाहों पर लगाम लगाने और टीकाकरण के प्रति विश्वास जगाने में रेडियो ने एक निःशब्द योद्धा की भूमिका निभाई।
खेल का जीवंत रोमांच: टेलीविजन के युग से पहले क्रिकेट रेडियो के माध्यम से ही भारत में एक जुनून बना। सुशील दोषी और जसु पटेल जैसे कमेंटेटरों की आवाज़ में खेल केवल सुना नहीं जाता था महसूस किया जाता था। रेडियो कमेंट्री ने खेल को अनुभव में बदल दिया।
डिजिटल पुनर्जन्म: रेडियो की मृत्यु की घोषणा कई बार की गई। टेलीविजन, रंगीन टीवी और फिर इंटरनेट के आगमन पर। लेकिन रेडियो हर बार फीनिक्स पक्षी की तरह अपनी ही राख से पुनर्जन्म लेता रहा। आज वह स्मार्टफोन में सिमट चुका है। पॉडकास्ट और डिजिटल स्ट्रीमिंग के रूप में ऑन-डिमांड हो गया है। युवा पीढ़ी कार में एफएम सुनती है, जिम में पॉडकास्ट और सोशल मीडिया के जरिए आरजे से संवाद करती है। आत्मा वही है, केवल कलेवर बदला है।
गूंज जो कभी थमेगी नहीं: रेडियो केवल फ्रीक्वेंसी का खेल नहीं, बल्कि संवेदनाओं का स्पंदन है। यह उस अकेले ड्राइवर का साथी है, उस किसान का संबल है जो अकेले खेत सींचता है और उस छात्र का सहचर है जो रात भर जागकर सपने गढ़ता है।
विश्व रेडियो दिवस हमें याद दिलाता है कि यह माध्यम नफरत के दौर में मोहब्बत का गीत सुनाता है, अज्ञानता के अंधेरों में ज्ञान की लौ जलाता है और मानवता को एक सूत्र में पिरोता है।
रेडियो मरा नहीं है वह केवल बदल गया है। अधिक प्रखर, अधिक व्यक्तिगत और अधिक जीवंत होकर। यह ईथर की लहरों का वही अनहद नाद है, जो तब तक गूंजता रहेगा, जब तक मनुष्य के भीतर संवाद की प्यास जीवित है।आवाज़ कभी बूढ़ी नहीं होती वह केवल अपनी आवृत्ति बदल लेती है। रेडियो कल भी सत्य का स्वर था, आज भी चेतना का स्पंदन है और कल भी मानवता की धड़कन रहेगा।
(साभार: यह लेख वरिष्ठ पत्रकार विश्व नाथ झा द्वारा लिखा गया है। मूल रूप से इसका प्रकाशन प्रसार भारती में हुआ था।)

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