धरोहर: जीवन की गाड़ी खींचने वाली बैलगाड़ी हुई दूर

Traditional Transport, Old transport

सभ्यता के विकास के साथ मनुष्य ने नए-नए प्रयोग करते हुए जीवन की गाड़ी को चलाने के लिए अनेक तरह के साधन और औजार विकसित किए। हमारे पूर्वज हमेशा प्रकृति के साथ तादात्म्य बैठाकर विकास की राह पर आगे बढ़े। जब आज की तरह सड़कें नहीं थीं, आधुनिक विकास का माहौल नहीं था, तब मनुष्य ने बैलगाड़ी के सहारे दुनिया नाप ली। परिवहन के साधन के रूप में बैलगाड़ी से ही मनुष्य ने एक कोने से दूसरे कोने तक की यात्राएं कीं। राजमहलों, किलों और भवनों को बनाने के लिए निर्माण सामग्री बैलगाड़ी से ही ले जाए गए। लेकिन हमारी विरासत के ये अनमोल धरोहर अब विलुप्त होने की कगार पर हैं।

जखनी जल ग्राम के संस्थापक और जल योद्धा उमा शंकर पांडेय बताते हैं कि जब ट्रैक्टर आया तो बैलगाड़ी का प्रयोग बंद होना शुरू हो गया। बैलगाड़ी को ट्रैक्टर ने निगल लिया। एक समय बुंदेलखंड के 13 जिलों के 11000 गांव में 9 लाख 50 हजार बैलगाड़ियां थीं। हर गांव में करीब 95 बैलगाड़ी थी। इसको बनाने वाले कारीगर, जिनका एक जमाने में इंजीनियर के बराबर सम्मान था, अब या तो वृद्ध हो गए अथवा काम नहीं होने से दूसरे काम करके जीविका चलाने के लिए पलायन कर गए।

बैलगाड़ी में न तो पेट्रोल-डीजल की जरूरत पड़ती थी और न ही इलेक्ट्रिक बैटरी की। यह गाड़ी बैलों से खींची जाती थी। इसीलिए इसका नाम बैलगाड़ी पड़ा। सर्वोदय कार्यकर्ता पांडे के मुताबिक यह विश्व का सबसे पुराना यातायात और सामान ढोने का साधन है। पहिया मात्र बैलगाड़ी नहीं है, बल्कि जीवन है, जीवन जीने की युक्ति है। इन पहियों से जीवन की नई शुरुआत होती है। पहिया हमें संदेश देता है निरंतर चलते रहो। लकड़ी के ये पहिए आपको मंजिल तक पहुंचाते हैं। यह गांव गरीब की रेलगाड़ी है, जो बिना पेट्रोल के बिना इंजन की चलती है। बगैर बिजली के यहां तक कि बिना ड्राइवर के भी चलती है।

यह पहिया घर से बीज खेत को देते हैं। खेत से खलियान को देते हैं, खलिहान से घर को देते हैं, घर से बाजार को देते हैं, बाजार से फिर घर लाते हैं। बुंदेलखंड में लकड़ी के पहिए लकड़ी की गाड़ी को स्थानीय बढ़ई कारीगर बनाते थे। ये कारीगर 12 महीने बबूल की लकड़ी से बैल गाड़ी के पहिए बनाते थे। जब ट्रैक्टर नहीं था। लंबी दूरी की यात्रा बैलगाड़ी से होती थी। इमरजेंसी के लिए एक पहिया अलग से गाड़ी में रखा जाता था। इन बैलगाड़ियों की त्योहारों में नजर उतारी जाती थी। साफ-सुथरा कर रंग-रोगन कर पूजा की जाती थी। बैलों को रंगों से रंगा जाता था। गले में घंटी बांधी जाती थी। गाड़ी को चमकाया जाता था। पहियों को तेल पिलाया जाता था। मनुष्य ने खेती कब शुरू की इसका उत्तर सहज नहीं है।

शायद आदिमानव जब मानव बना तबसे सभी समस्याओं का हल उसने लकड़ी के हल से ढूंढा, सहायता के लिए लकड़ी की गाड़ी बनाई, गाड़ी में पहिये लगाए। ना तो हल में लोहा लगाया, ना पहिया में लोहा लगाया न, गाड़ी में लोहा लगाया कितनी बड़ी तकलीफ थी उस जमाने के महापुरुषों में इस गाड़ी को बनाने वाले को विश्वकर्मा की उपाधि थी। तब जातियां नहीं थी जिनके हाथों से विश्व का निर्माण हुआ। विश्व के मानव जाति को कर्म करने की प्रेरणा दी। विश्वकर्मा आज अपने जीवन जीने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

इस ट्रैक्टर युग ने गांव के उन इंजीनियरों को भागने पर मजबूर कर दिया जो बैल गाड़ी का पहिया, हल, चारपाई, वखर, हसिया, खुरपी, कुदाली, फावड़ा, गेहूं पीसने का जतवा, अनाज कूटने का मुसर, कृषि से संबंधित वे सभी औजार गांव में ही बनाते थे। जो आज अच्छे से अच्छे इंजीनियर शहर में नहीं बना सकता। पांडेय जी बताते हैं कि उनके गांव के बढ़ई चाचा, लोहार चाचा को वे बचपन से देखते चला आ रहे हैं। वे गांव के किसानों का काम ईमानदारी से करते थे। किसान भी इनका बहुत सम्मान करते थे। किसानी के औजार के सबसे बड़े डॉक्टर थे।

हर गांव में पूरे बुंदेलखंड में इनकी संख्या 96612 थी। प्रत्येक गांव में कम से कम पांच पांच परिवार इन कारीगरों के हुआ करते थी। सबसे अधिक बैलगाड़ी बांदा जिले के गांव में थी। ऐसा उल्लेख गजट ईयर में किया गया है। आज किसी भी गांव, शहर में ना तो नई बैल गाड़ी के पहिया बनाने वाले हैं, ना ही बैलगाड़ी। सर्वोदय कार्यकर्ता होने के नाते वे कई गांवों में घूमे तो कई दिनों के बाद बबेरू में अतर्रा रोड पर एक झोपड़ी में रहने वाले 78 वर्षीय शिव गुलाम बढ़ई विश्वकर्मा जो झोपड़ी में रह कर कार्य करते हैं मिले जो आज भी बैल गाड़ी का पहिया बनाते हैं। वे बड़े दुख के साथ कहते हैं कि यह हमारा पैतृक धंधा है, कई पीढ़ियों से कर रहे हैं। उस जमाने में बैल गाड़ी के पहिया की 20 अंगुल, 20 रुपए जोड़ी बिकती थी, 2005 में 28 अंगुल परिया की कीमत ₹3000 थी, साल भर में 50 जोड़ी पहिया बिक जाते थे। वर्तमान में 4 माह से एक जोड़ी पहिया नहीं बिका।

ट्रैक्टर हमारी रोजी रोटी खा गया, भविष्य की पीढ़ी का हुनर खा गया। हमको भी कलाकारों की भांति जीवन यापन के लिए पेंशन चाहिए। ना जमीन है, ना कोई दूसरा धंधा जानते हैं। ऐसा ही हाल बुंदेलखंड के लगभग हर गांव के कारीगरों का है। दशा है जो बुजुर्ग हैं, इनके हुनर से देशभर का पेट भरा गया आज यह खुद भूखे हैं, इनकी कौन सुनेगा और क्यों सुनेगा मशीन के युग में बहुत बुद्धिमान समाज को अब क्या जरूरत है। यही एक बड़ा प्रश्न है? हमारा देश गांव की कुटीर उद्योग से चलता था। कुटीर उद्योग में इनका बड़ा भारी योगदान है। खेत खलियान गांव के विकास में यह पूरे सहभागी थे। भारत के गांव के लकड़ी की सबसे पुराने जहाज को बनाने वाले कारीगर की बदौलत हर गरीब से गरीब किसान के पास अपना बगैर बैंक कर्ज का निजी हल था, बैल था, बैलगाड़ी थी। इनको बनवाने व खरीदने के लिए बैंक से लोन नहीं लेना पड़ता था।

आज हर किसान के पास ट्रैक्टर नहीं है, लेकिन जिसके पास है लाखों रुपए बैंक का कर्ज है, जमीन बिक रही है, किसान आत्महत्या कर रहे हैं। क्योंकि शायद इसलिए कि हल बैल गाड़ी बनाने वाले की कीमत तुम्हारे समझ में नहीं आई। क्योंकि वह सस्ता था सुलभ था आज भी बचाया जा सकता है, भविष्य में इनकी जरूरत पड़ेगी। पांडेय जी बताते हैं कि बचपन में अपने बाबा के साथ बैल गाड़ी में बैठ कर दीपावली के समय पास के गांव में मेला देखने जाता था। हजारों बैलगाड़ियां हुआ करती थी, बाबा दाई किस्से कहानी सुनाया करते थे। अपनी बैलगाड़ी को साफ सुथरा करते थे। गांव में कई प्रकार के लकड़ी के हाल बना करते थे। पहले छोटे, बड़े, मझोले बना करते थे। बैलगाड़ी भी कई प्रकार की बनती थी लकड़ी की, आज सब खत्म हो गया।

एक सच्ची घटना है। 1991 में एक राष्ट्रीय समाचार पत्र में छपी थी। अमेरिका के कुछ लोग खजुराहो के पास एक गांव में घूमने के लिए गए। उन्होंने गांव के कारीगर को लकड़ी की बैलगाड़ी का पहिया बनाते देखा। उनके मन में प्रश्न उठा कि भारत के कारीगर कितने योग्य कि पूरे पहिए में कहीं भी एक कील लोहा नहीं लगा कील भी लकडी की, उसे बैलगाड़ी में लगाया और उसके ऊपर 1 टन वजन रखा 10 कुंटल रखा और खुद गाड़ी के ऊपर 10 किलोमीटर बैठकर यात्रा की। उनके समझ में आ गया कि भारत के गांव के यही असली इंजीनियर है, जिन्होंने एक भी लोहे की कील नहीं लगाई पहिए में, यह अमेरिका के इंजीनियरों से ज्यादा बुद्धिमान है। क्योंकि अमेरिका में तांगा, इक्का, खेती के औजार में लकड़ी कम, लोहा ज्यादा लगता है।

भारत के कृषि औजारों में लकड़ी ही लगती है, लोहा नाममात्र का है वे इस तकनीक को अमेरिका ले जाने के लिए 2 जोड़ी लकड़ी के पहिया अमेरिका ले जाने के लिए 15 दिन खजुराहो में पड़े रहे। एयरपोर्ट अथॉरिटी भारत सरकार ने जब अनुमति दी तब वह अपने साथ भारत से बैलगाड़ी के पहिया ले गए यह एक उदाहरण है। आचार्य विनोबा जी, गांधीजी सर्वोदय विचारधारा ने गांव के किसान की गाड़ी को सबसे उत्तम आवागमन का साधन माना।

(यह लेख मूल रूप से जनसत्ता ऑनलाइन में छपा है। वहां से साभार लिया गया है)

cmarg author

Sanjay Dubey is Graduated from the University of Allahabad and Post Graduated from SHUATS in Mass Communication. He has served long in Print as well as Digital Media. He is a Researcher, Academician, and very passionate about Content and Features Writing on National, International, and Social Issues. Currently, he is working as a Digital Journalist in Jansatta.com (The Indian Express Group) at Noida in India. Sanjay is the Director of the Center for Media Analysis and Research Group (CMARG) and also a Convenor for the Apni Lekhan Mandali.

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