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सीने पर खंजर जैसी लगती है अश्वेत फ्लायड की कहानी

इतिहास में कुछ घटनाएं, हादसे और गलतियां वर्षों सीने पर सुई की तरह चुभती रहती हैं। दरअसल ये इंसानी समाज और व्यवस्था के उस कालखंड पर कलंक बन जाती है, जिसमें वे घटित हुई होती हैं। नस्लीय हमले ऐसी ही सोच से उपजती हैं। पश्चिम के देशों में यह व्यापक रूप से व्याप्त है। नस्लवादी सोच और उसके पैरोकारों का पश्चिम के देशों में कितना दबदबा है उसका सबूत है 25 मई 2020 की घटना।

इस दिन अमेरिका के मिनीपोलिस शहर में 46 वर्षीय एक अश्वेत नागरिक जॉर्ज फ्लॉयड (George Floyd) को कथित रूप से $20 के नकली नोट जैसे मामूली आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था। वहां की पुलिस विभाग का गोरा यानी श्वेत अधिकारी डेरेक चाउविन (Derek Chauvin)ने उसको हथकड़ी बांध दी और विरोध करने पर बुरी तरह पिटाई करने के बाद दिन दहाड़े मुख्य बाजार में ही उसकी गर्दन को 9 मिनट तक अपने घुटने के नीचे दबाए रखा था। दोनों हाथ हथकड़ी से बंधे थे और फ्लॉयड अपनी जान की भीख मांगते हुए चिल्ला रहा था कि वह सांस नहीं ले पा रहा है, लेकिन गोरे पुलिस अधिकारी को दया नहीं आई। इससे फ्लॉयड की मौके पर ही मौत हो गई। यह सिर्फ अमेरिका के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए बेहद निराशाजनक और दिल दहला देने वाली क्रूर वारदात थी। खुद अमेरिकी गोरा समाज (श्वेत रंग वाले) इस घटना से दहल गया था।

बहरहाल जहां नस्लवाद इतना गहरे तक समाया हुआ है, वहीं की न्याय व्यवस्था में उम्मीद की किरण भी दिखी। एक साल में ही आरोपी पुलिस अधिकारी को वहां की अदालत ने 22 वर्ष छह महीने की कठोर सजा दी है। हम किसी न्यायिक प्रक्रिया पर टिप्पणी नहीं करना चाहते हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि ऐसी घटना भारत में हुई होती तो इतनी जल्दी और तेज सजा शायद ही मिलती और मिलती भी तो इतनी कड़ी सजा की उम्मीद भी नहीं की जा सकती है। ऐसा इसलिए क्योंकि यहां सुनवाई के दौरान स्पष्ट तथ्यों को रखने के बजाए घटना से जुड़े लोग तथ्यों को उलझाने में और लंबा खींचने में ज्यादा दिलचस्पी लेते हैं।

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अश्वेत नागरिक जॉर्ज फ्लॉयड की क्रूरतम हत्या न तो पहली घटना है और न ही अंतिम, लेकिन इस घटना के बहाने नस्लीय सोच रखने वाले समाज की क्रूरता दुनिया को हमेशा झकझोरती रहेगी।

यही वजह है कि अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन (JOE BIDEN)ने नेशनल टेलीविजन पर कहा “यह दिन के उजाले में की गयी हत्या थी और इसने पूरे दुनिया की आंखों से पट्टी हटा दी है। ‘सिस्टमैटिक नस्लवाद’ इस देश की आत्मा पर एक धब्बा है।”

cmarg author

Sanjay Dubey is Graduated from the University of Allahabad and Post Graduated from SHUATS in Mass Communication. He has served long in Print as well as Digital Media. He is a Researcher, Academician, and very passionate about Content and Features Writing on National, International, and Social Issues. Currently, he is working as a Digital Journalist in Jansatta.com (The Indian Express Group) at Noida in India. Sanjay is the Director of the Center for Media Analysis and Research Group (CMARG) and also a Convenor for the Apni Lekhan Mandali.

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