Supertech twin towers explosion: एक ट्विन टावर गिरा, कई अब भी खड़े हैं

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Noida Supertech Twin Towers Demolition News: रविवार 28 अगस्त 2022 देश की बहुमंजिली इमारतों के इतिहास में एक ऐसी तारीख है, जिस दिन विवादों से घिरे नोएडा स्थित सुपरटेक ट्विन टावर्स (29 मंजिला सेयेन-Ceyane ओर 32 मंजिला अपेक्स- Apex)को ध्वस्त कर दिया गया। दोनों भवनों को गैरकानूनी तरीके अपनाकर और मानकों का उल्लंघन करके बनाया गया था। इसको गिराने में करीब 17 करोड़ 55 लाख रुपये से ज्यादा का खर्च आया है। सुपरटेक कंपनी का कहना है कि उसको अनुमानित 500 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। कंपनी के अध्यक्ष आर.के. अरोड़ा ने बताया कि इसमें निर्माण खर्च और बैंकों में जा रहे ब्याज लागत भी शामिल है।

इमारत गिराने में लगा 12 सेकंड का समय

जेट डिमोलिशन के प्रबंध निदेशक जो ब्रिंकमैन ने कहा कि रविवार को नोएडा में सुपरटेक ट्विन टावरों को धराशायी करने में 12 सेकंड का समय लगा। डेवलपर ने इस काम के लिए एडिफिस इंजीनियरिंग कंपनी को ठेका दिया था, जिसने दक्षिण अफ्रीका के जेट डिमोलिशन कंपनी के सहयोग से इसे पूरा किया।

रेजिडेंट्स एसोसिएशन के लोगों ने तकरीबन पौने दस साल की लंबी कानूनी लड़ाई और प्रभावशाली लोगों के दबाव के साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक नुकसान और भारी मानसिक पीड़ा के बीच इन टॉवरों को ध्वस्त कराने में सफल तो हो गए, लेकिन बढ़ता शहरीकरण और कम होती जमीन के बीच शहरों में रहने के लिए छोटी सी जगह पाने में बिल्डरों की जो मनमानी आम जनता को झेलनी पड़ रही है, उसका हिसाब कब होगा, यह एक बड़ा सवाल है।

शहरों में नौकरी कर रहे लोग या तो किराए के मकानों में रह रहे हैं या फिर पीजी लेकर काम चला रहे हैं। वर्षों पहले अपने घरों से दूर दूसरे और बड़े शहरों में रहने के बाद बच्चों की अच्छी शिक्षा और रोजगार के ज्यादा अवसरों की उम्मीद में शहरों को नहीं छोड़ने के पीछे उनका एक बड़ा सपना अपना घर होने का होता है।

खास बातें :
पौने दस साल लंबी चली कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार देश की सबसे बड़ी अदालत के आदेश पर 100 मीटर ऊंची इमारत को बारूदों के विस्फोट से गिरा दिया गया। इससे बिल्डर काे अनुमानित 500 करोड़ रुपये का नुकसान उसकी अपनी गलती से हुआ। 

एमराल्ड कोर्ट हाउसिंग सोसाइटी के परिसर में भवन मानदंडों का उल्लंघन करके रियल एस्टेट डेवलपर सुपरटेक ग्रुप द्वारा बनाए गए दोनों टॉवरों के सुरक्षित ध्वस्तीकरण से अनुमानित 80,000 टन मलबा निकला और हवा में  बेहिसाब धूल ही धूल भर गए। 

इसी वजह से अधिकतर लोग रेजिडेंसियल सोसायटीज में फ्लैट लेने के लिए परेशान रहते हैं। शुरू-शुरू में सभी बिल्डर उनको तमाम तरह के लुभावने सपने दिखाते हैं मसलन स्थानीय प्राधिकरण से नक्शा स्वीकृत होने, 24 घंटे बिजली-पानी मिलने, सुरक्षा, ग्रीन एरिया, बेसमेंट में पार्किंग, क्लब, पूल आदि सुविधाएं मुहैया होने की बात करते हैं, लेकिन लंबी जद्दोजहद के बाद जब फ्लैट या अपार्टमेंट का पजेशन मिलता है तो उसमें बहुत सी बुनियादी कमियां साफ दिखती हैं।

कई और दिक्कतें भी हैं

दिक्कत सिर्फ इतनी ही नहीं है, वादे के मुताबिक तय तारीख पर शायद ही किसी को पजेशन मिलता हो। करीब-करीब सभी बिल्डर बुकिंग के वक्त जो तारीख बताते हैं, उस तारीख से दो साल बाद भी मुश्किल से ही पजेशन देते हैं। बिल्डरों की मनमानी और फ्लैट नहीं मिलने से जो आर्थिक और मानसिक संकट झेलना होता है, वह जिंदगी भर के लिए नासूर बन जाता है।

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मध्य या उच्च मध्य वर्ग का कोई भी खरीदार जब फ्लैट या अपार्टमेंट की बुकिंग कराता है तो वह उसके लिए बैंक से लोन लेता है। जिसकी मासिक किस्त या ईएमआई कई हजार रुपये होती हैं और उसे दस से पंद्रह साल या इससे भी ज्यादा समय तक चुकानी होते हैं। अगर तय समय में उसको फ्लैट नहीं मिला तो उसे किराए के ही मकान में रहने को विवश होना पड़ेगा।

ऐसे में उसे घर का किराया और बैंक के लोन की ईएमआई दोनों चुकानी होती है। यह उसके रोजाना के दूसरे खर्चों, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, बढ़ती महंगाई और अपना स्टेटस बनाए रखे रहने के लिए भारी संघर्ष करने को विवश करता है। यह खरीदारों पर दोहरी मार पड़ने जैसी है। इसके लिए उन्हें अपनी कई जरूरतों को दरकिनार करना पड़ता है। तमाम ऐसे लोग भी हैं जिन्हें इसके लिए उधार तक लेना पड़ रहा है।

इनकी रक्षा के लिए संसद से पास रियल एस्टेट (रेग्युलेशन एंड डेवेलपमेंट) एक्ट 2016 (रेरा / RERA) कानून है, लेकिन फ्लैट या अपार्टमेंट के खरीदार आम जनता होते हैं और बिल्डर्स बड़े पूंजीपति और दबंग होते हैं। सभी उपभोक्ता कानून के जानकार नहीं है और जो जानते भी हैं, वे कोर्ट-कचहरी की लंबी कानूनी लड़ाई और जटिल सुनवाई व्यवस्था के चलते इसमें उलझना नहीं चाहते हैं। लिहाजा बिल्डर्स के चंगुल में फंसने के सिवाय कोई चारा नहीं बचता है। ऐसे में एमराल्ड कोर्ट के हाउसिंग प्रोजेक्ट के तहत बनाए गए सुपरटेक ट्विन टावर को तो गिरा दिया गया, लेकिन वह सवाल तो अब भी कायम है कि उपभोक्ताओं की मुसीबत बने ट्विन टॉवर जैसे दूसरे ढेरों टॉवर तो अब भी खड़े हैं। इनका हिसाब कब होगा?

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