कृषि कानून वापस: शीर्ष सत्ता का ऐसे हिल जाना…

देश की शीर्ष सत्ता पर बैठी सबसे बड़ी पार्टी भाजपा को अपनी स्थापना के बाद शायद पहली बार ऐसे हालात का सामना करना पड़ा कि उसे संसद से पास उस कानून को वापस लेना पड़ा हो, जिसके विरोध में देश और देश के बाहर भी आंदोलन हुए हैं। उससे भी बड़ी चौंकाने वाली बात यह है कि इन कानूनों को उस प्रधानमंत्री ने वापस लिए, जो भाजपा के अब तक के इतिहास में सबसे दबंग प्रधानमंत्री के रूप में जाने जाते हैं। देश ही नहीं, देश के बाहर भी वैश्विक स्तर पर उनके नेतृत्व के चर्चे होते हैं।

दो सौ सालों तक दुनिया को अपना गुलाम बनाकर रखने वाली ब्रिटिश हुकूमत के वर्तमान प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने हाल ही में ग्लासगो में हुए सीओपी26 जलवायु शिखर सम्मेलन (वर्ल्ड लीडर्स समिट) में पीएम मोदी के नेतृत्व की प्रशंसा की थी। अमेरिका, रूस, आस्ट्रेलिया, इस्राइल, जापान, ईरान से लेकर खाड़ी देश सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, इराक, कुवैत तक के राष्ट्राध्यक्ष पीएम मोदी की दूरदर्शिता के कायल हैं।

: खास बातें :

चौंकाने वाली बात यह है कि इन कानूनों को उस प्रधानमंत्री ने वापस लिए, जो भाजपा के अब तक के इतिहास में सबसे दबंग प्रधानमंत्री के रूप में जाने जाते हैं।

पीएम मोदी की वैश्विक छवि दूरदर्शी, तेज, साहसी और पीछे न हटने वाले नेता की रही है, कई देशों के राष्ट्राध्यक्ष इस बात को सार्वजनिक रूप से बोल चुके हैं।

इस कदम से राजनीतिक रूप से यही संदेश जाएगा कि चुनाव में पराजय की आशंका से विवश होकर मोदी ने संसद से पास कानूनों को वापस लिया

उनकी वैश्विक छवि विश्व के सबसे शक्तिशाली और लोकप्रिय नेता के रूप में बन रही थी। इन सबके बावजूद तस्वीर का दूसरा पक्ष यह भी है कि उन्होंने जिस तरह से गुरुपर्व के दिन राष्ट्र के नाम संबोधन करके बिना शर्त कानून वापस लेने की घोषणा की, उससे उनके विनम्र होने की छवि भी खासी झलकी।

ऐसे में किसी को भी यह उम्मीद नहीं थी कि पीएम मोदी अपने क़दम पीछे खींचेंगे। खुद विपक्षी दल, भले ही राजनीतिक रूप से लगातार विरोध में आवाजें उठाते रहे हैं, लेकिन वे भी इतना विश्वास के साथ कहने की स्थिति में नहीं थे कि मोदी सरकार कृषि कानून वापस लेगी।

किसान संगठनों और सरकार के बीच कई चरणों की बात हुई थी, लेकिन सरकार क़ानून वापस लेने को तैयार नहीं थी। हालांकि सरकार ने कृषि कानून वापस लिए हैं, लेकिन अब इसके मायने अलग-अलग निकाले जा रहे हैं। कुछ लोग इसके निहितार्थ यूपी, पंजाब समेत पांच राज्यों के चुनावों में निकाल रहे हैं, तो कुछ अन्य लोगों का कहना है कि सरकार के अंदर इसको लेकर विरोध शुरू हो गया था।

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इसमें सबसे बड़ा नाम मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक का था। वे भाजपा के साथ रहकर भी खुले रूप में मोदी सरकार को चेतावनी देते थे। इसी तरह भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी आए दिन भाजपा को लगभग धमकाते रहने के अंदाज में ट्विटर पर ट्वीट करके विरोध करते रहते थे। इससे कहा जा रहा है कि मोदी सरकार भयभीत हो गई थी।

हालांकि चुनावी असर के प्रति ज्यादा संवेदनशीलता को कई विशेषज्ञ मुख्य वजह मान रहे हैं। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में किसानों की नाराज़गी से चुनावी नुक़सान की आशंका थी। ऐसे में चुनाव से पहले यह क़दम उठाया गया है।

बहरहाल संयुक्त किसान मोर्चा ने पीएम मोदी की घोषणा के बाद कहा है कि विरोध प्रदर्शन सिर्फ़ नए कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ नहीं बल्कि फसलों के लाभकारी दाम की वैधानिक गारंटी के लिए भी था, जिस पर अभी भी कुछ फ़ैसला नहीं हुआ है। मोर्चे की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि तीन कृषि क़ानूनों को रद्द करने के सरकार के फ़ैसले का स्वागत है लेकिन वे संसदीय प्रक्रियाओं के माध्यम से घोषणा के प्रभावी होने तक इंतज़ार करेंगे।

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने तीनों केंद्रीय कृषि कानूनों को निरस्त किए जाने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा के बाद शुक्रवार को कहा कि देश के अन्नदाताओं ने अपने सत्याग्रह से सरकार के अहंकार को झुका दिया है और अब प्रधानमंत्री मोदी को आगे ऐसा ‘दुस्साहस’ नहीं करना चाहिए।

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के अध्यक्ष और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी अपने ट्वीट में लिखा है, ”कृषि क़ानून शुरू से ही असंवैधानिक था। सरकार के अहंकार के कारण किसानों को सड़क पर उतरना पड़ा। अगर सरकार बाल हठ नहीं करती तो 700 से ज़्यादा किसानों की जान नहीं जाती। किसान आंदोलन को बधाई। पंजाब और उत्तर प्रदेश में बीजेपी की पतली हालत को देखते हुए मोदी के पास और कोई विकल्प नहीं था।”

ओवैसी ने तंज़ कसते हुए पीएम मोदी को निशाने पर लिया है। ओवैसी ने एक शेर में लिखा है, “दहन पर हैं उन के गुमां कैसे-कैसे, कलाम आते हैं दरमियां कैसे-कैसे, ज़मीन-ए-चमन गुल खिलाती है क्या-क्या, बदलता है रंग आसमां कैसे-कैसे।”

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