विषाणु से किसान तक राजनीति की गुंजाइश और उम्मीद

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भारत में राजनीति यहां के सामाजिक जींस में समाई हुई है। हम कोई भी काम करते हैं, तो तुरंत राजनीति शुरू हो जाती है। ऐसी कोई चीज, घटना या समय नहीं है, जिसमें राजनीति होने की गुंजाइश न हो। दुनियाभर में कोविड महामारी ने लाखों लोगों की जिंदगी छीन ली। व्यापार खत्म कर दिया, चौतरफा तबाही मचा दी। अर्थव्यवस्था दो दशक पीछे हो गई। ऐसे में जब इससे निपटने के लिए सबको मिलकर कोशिश करनी चाहिए थी, तब हमारे धुरंधर जीवित लोगों ने इसमें भी राजनीति का सांचा ढूंढ़ निकाला। उस्तादी का ऐसा आलम इसके पहले कभी देखा गया हो, हम नहीं कह सकते हैं।

जब से कोरोना विषाणु के टीके आए हैं, तब से लड़ाई इस बात को लेकर हो रही है, कि टीका किस दल या सरकार की है। विपक्ष का आरोप है कि सरकारी टीका अच्छा नहीं है, तो सरकार का कहना है कि टीका वैज्ञानिकों ने बनाया है, अच्छा या बुरा सोचकर वैज्ञानिक काम नहीं करते हैं। नवीनतम मामला यह है कि हमारे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने राजधानी में अपनी तस्वीर के साथ बड़े-बड़े पोस्टर्स-होर्डिंग्स लगवाकर आम लोगों से पूछा है कि “वैक्सीन लगवाई क्या” तो उसमें भी राजनीति के तपस्वियों ने शोध का नया विषय निकाल लिया। भाजपा की दिल्ली इकाई के उपाध्यक्ष राजीव बब्बर ने उसी पोस्टर पर एक पंक्ति और जोड़ दी। उसमें लिखा, “वैक्सीन लगवाई क्या, जो दिल्ली को मोदी जी मुफ्त दे रहे हैं।” नीचे लिख दिया कि “करेक्टेड बाइ राजीव बब्बर।” इसमें पहले की ही तरह अरविंद केजरीवाल की तस्वीर भी है। नीचे परिवार कल्याण निदेशालय दिल्ली सरकार भी लिखा है।

इसके बाद साथ में उन्होंने ट्वीट कर बता भी दिया कि “भाई @Arvindkejriwal जी दिल्ली में जो आपने करोड़ों रुपये के होर्डिंग लगवाए हैं, शायद अनजाने में आप पूरी लाइन लिखना भूल गए। मैंने ठीक करवा दी। आपकी शक्ल से कोई दुश्मनी नहीं, बस मैं चाहता हूं कि संदेश सही जाए।” बताया कि वह अरविंद केजरीवाल जी को उनका उचित श्रेय देना चाहते थे।

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दिल्ली में तीन कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे आंदोलन में मौजूद किसान। (Photo Source- India TV/ PTI File)

इधर, किसानों का तीन कृषि कानूनों को लेकर दिल्ली की सीमाओं पर आंदोलन जारी है तो उधर कई राजनेता इस उम्मीद में सक्रियता से लग गए हैं कि इस बहाने उनकी पिछड़ रही राजनीति फिर आगे आ जाएगी। कई राजनेता आंदोलन स्थल पर पहुंचकर अपनी हाजिरी लगा चुके हैं। किसान आंदोलन को समर्थन तो ऐसे देते हैं, मानों कल जरूरत पड़ जाए तो वे जान भी दे देंगे।

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मजे की बात यह है कि वहां कई ऐसे लोग भी पहुंच रहे हैं, जिन्हें यह पता ही नहीं है कि यह आंदोलन हो क्यों रहा है। एक टीवी चैनल के पत्रकार ने उनसे पूछा कि वे यहां आंदोलन का समर्थन क्यों कर रहे हैं तो उन्होंने कहा कि मोदी जी किसानों के साथ गलत कर रहे हैं, इसलिए हम किसानों के साथ खड़े हैं। जब पत्रकार ने उनसे पूछा कि वे बताएं कि मोदी जी ने क्या गलती की है तो वे बोले कि कोई कानून बनाए हैं, लेकिन मुझे यह पता नहीं है कि वह कानून क्या है।

अब आप बताइए कि इन समर्थनकारी शक्तियों की ऊर्जा जिस काम में खर्च हो रही है, उससे देश को या इन्हें खुद क्या मिल रहा है। ऐसी बचकानी हरकत करने वाले लोग ही आंदोलन में भीड़ जुटाते हैं। दरअसल आंदोलन कुछ सैकड़े लोगों का है, लेकिन दंगा, फसाद, हिंसा और असामाजिक हरकत में लिप्त लोगों की संख्या हजारों में है। अगर ये लोग उस काम को करते, जिसमें ये निपुण हैं तो इससे इन्हें भी फायदा होता और देश को भी कुछ मिलता। लेकिन हर काम में राजनीति की गुंजाइश के चलते ऐसा होना संभव नहीं लगता है।

cmarg author

Sanjay Dubey is Graduated from the University of Allahabad and Post Graduated from SHUATS in Mass Communication. He has served long in Print as well as Digital Media. He is a Researcher, Academician, and very passionate about Content and Features Writing on National, International, and Social Issues. Currently, he is working as a Digital Journalist in Jansatta.com (The Indian Express Group) at Noida in India. Sanjay is the Director of the Center for Media Analysis and Research Group (CMARG) and also a Convenor for the Apni Lekhan Mandali.

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