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अच्छे नहीं चल रहें ‘दबंग’ के दिन, कोरोना से पहले अफगानिस्तान में अमेरिका की मात

Contributor: Akash Singh Photo Source: Deccan Herald

अमेरिका और उसकी अंतरराष्ट्रीय नीतियां लगता है इस समय कारगर साबित नहीं हो रही हैं। कोरोना वायरस के हमले से बुरी तरह जूझ रहे संयुक्त राज्य अमेरिका कई अन्य मोर्च पर भी मात खा रहा है। कभी जिस तालिबान को अमेरिका आतंक की सबसे बड़ी वजह मानता था, उसी के साथ पिछले 29 फरवरी को फारस की खाड़ी स्थित प्रायद्वीपीय देश कतर की राजधानी दोहा में उसने एक समझौता किया है। यह वही तालिबान है जिसने 9/11 से लेकर 26/11 तक हुए तमाम आतंकी हमलों को अंजाम दिया था।

तालिबान से अमेरिकी समझौता का आधार अफगानिस्तान है। इसकी पहली शर्त अमेरिकी सैनिकों की संख्या अफगानिस्तान में 13,000 से घटाकर 8,600 करने की है। बचे हुए सैनिकों को भी अमेरिका 14 महीने में वहां से हटा लेगा। हालांकि अमेरिका ने अपने सैनिकों की संख्या में कटौती शुरू कर दी है। लेकिन तालिबान ने शर्तों का पालन नहीं किया। समझौते की दूसरी शर्त के मुताबिक तालिबान को आतंक के रास्ते से हटना था, लेकिन दोनों पक्षों में बातचीत के चौबीस घंटे बीतने से लेकर अब तक आधा दर्जन से अधिक आतंकी हमले हो चुके हैं। इन हमलों का जिम्मेदार अप्रत्यक्ष रूप से तालिबान को ही माना जा रहा है। ऐसे में इस समझौते अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका राष्ट्रपति ट्रंप और उनकी नीतियों की ही किरकिरी हो रही है।

समझौते की तीसरी शर्त के अनुसार तालिबान अपने कब्जे में रखे 1,000 अफगानी सैनिकों को रिहा करेगा, जिसके बदले में अफगानिस्तान सरकार भी 5000 तालिबानी लड़ाकों को रिहा करेगी। यह प्रक्रिया भी अब तक शुरू नहीं हो सकी है। बड़ी बात यह है कि समझौते के ठीक अगले दिन अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनकी सरकार तालिबान के 5 हजार कैदियों को रिहा नहीं करेगी। कहा कि हमारे बीच वार्ता के एजेंडे में यह बात शामिल हो सकती है, लेकिन वार्ता के लिए कोई जरूरी शर्त नहीं हो सकती। किसी भी कैदी की रिहाई अमेरिका के अधिकार क्षेत्र में नहीं है। यह अफगान सरकार के अधिकार क्षेत्र में है।

समझौते में शामिल शर्तों को सभी पक्षों द्वारा 135 दिन में पूरा करना था। अमेरिका अफगानिस्तान की जमीन को हमेशा के लिए छोड़ेगा या नहीं, इस पर अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने कहा- तालिबान से हुआ समझौता तभी पूरा होगा,जब तालिबान पूरी तरह से शांति कायम करने की दिशा में काम करेगा। इसके लिए तालिबान को आतंकी संगठन अलकायदा से अपने सारे रिश्ते तोड़ने होंगे। यह समझौता इस क्षेत्र में एक प्रयोग है। हम तालिबान पर नजर बनाए रखेंगे। अफगानिस्तान से अपनी सेना पूरी तरह से तभी हटाएंगे, जब हम पूरी तरह से संतुष्ट हो जाएंगे कि तालिबान आतंक का मार्ग छोड़ दिया है।

तालिबान भी इस समझौते से संतुष्ट नहीं है। वह अमेरिका की इस चाल को अच्छी तरह समझ रहा है कि अफगानिस्तान में वह अपना दबदबा इतनी जल्दी नहीं छोड़ेगा। ऐसे में तालिबान को भी अमेरिकी आश्वासन पर यकीन नहीं है। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना है कि अमेरिका का तालिबान के साथ सीधे जंग के स्थान पर समझौता करना उसकी कमजोरी दर्शा रही है। अमेरिका या तो वियतनाम की तरह अफगानिस्तान में अपनी इच्छानुसार विजय प्राप्त करने में खुद को नाकाम मान कर सैनिकों की वापसी में ही अपनी भलाई समझ चुका है या उसका कोई और उद्देश्य है जिसे वह समझौते से ही पूरा करना चाहता हो।

शायद अमेरिका तालिबान से सम्मानजनक समझौता करके अगले नवंबर में प्रस्तावित राष्ट्रपति चुनाव से पहले हरहाल में अपने सैनिकों को स्वदेश वापस बुलाने का संकल्प लिया हो। गौरतलब है कि द वाशिंगटन पोस्ट में छपी अफगानिस्तान पेपर्स रिपोर्ट के अनुसार बीते दो दशक में अमेरिका ने अफगानिस्तान में पानी की तरह धन बहाया है। अफगानिस्तान में अब तक 2400 से अधिक अमेरिकी सैनिक मारे गए हैं। 20,000 से ज्यादा घायल हुए हैं। यूएस डिपार्टमेंट ऑफ डिफेंस के मुताबिक अमेरिका ने अक्टूबर 2001 से सितंबर 2020 के बीच 19 वर्षों में अफगानिस्तान की अपनी रणनीति पर अब तक लगभग 900 बिलियन डॉलर खर्च कर चुका है।

इसके अलावा अब तक तालिबान समस्या के कारण अफगानिस्तान के एक लाख से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं। ज्ञात हो कि ऐसे ही एक रिपोर्ट वियतनाम से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के समय पेंटागन की ओर से जारी हुई थी, जिसमें वियतनाम में अमेरिकी सेना के संसाधनों की बर्बादी की आलोचना की गई थी।

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